[19+ Best] किसान पर सुंदर कविता | Short Poem On Farmer In Hindi

Poem On Farmer In Hindi :- भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां पर उन्हें मसीहा के रूप में पूजा जाता है। आज की स्थिति यह हो गई है कि उनकी मेहनत फिका हो गई। दिन-रात मेहनत करने के बावजूद भी वह चैन से दो वक्त की रोटी भी उसे नसीब नहीं होता। वह पूरे देश को अन्न खिलाने वाला आज बेबस और निराश हैं। 

वह हमेशा अपनी फसल को आधे भाव बेचकर फिर भी लगन और मेहनत करता है। उसे तो बस दूसरे को पेट भरना अच्छा लगता है। वह नित्य प्रति दिन सुबह उठकर बैलों के संग भारतीय इंसान की तरह मेहनत करने चला जाता है। हम लोगों के नजर में दो व्यक्ति ही अपना कार्य ईमानदारी से करते हैं। किसान और दुसरा जवान। ऐसे अन्न दाता को मेरे तरफ से बार बार नमन है। 

हम यहां पर किसान दिवस 3 दिसम्बर पर विशेष ईमानदार और कर्म निष्ठा भारतीय किसान पर (Kisan Par Kavita) बहुत ही सुंदर और सर्वक्षेष्ठ कविता आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूं।

किसान

Poem On Farmer

मानवता का सच्चा सेवक,

श्रम से गहरा नाता।

सह कर सर्दी, गर्मी वर्षा,

फसलें सदा उगाता।।

गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा,

जो कुछ घर में आता।

दालें, सब्जी और मसाले,

सब किसान उपजाता।।

दूर शहर से छोटे-छोटे,

गाँवों में यह रहता।

सहता जीवन भर अभाव पर

कभी नहीं कुछ कहता।।

देश धर्म की रक्षा करता,

परम्परा का ज्ञाता।

नैतिकता को धर्म मानकर,

अपना धर्म निभाता।।

खुद रूखा सूखा खाता है,

सब जग को दे देता।

यही लिखा किस्मत में मेरी,

मन को समझा लेता।।

ईश्वर की इच्छा पर निर्भर,

है किसान की खेती।

कभी-कभी भोले किसान को,

यह भारी दुख देती।।

जीव जन्तु जंगल के पक्षी,

सब उत्पात मचाते।

ओले, सूखा अतिवर्षा भी,

फसल नष्ट कर जाते।।

भोला-भाला प्रकृति पुत्र यह,

समझ नहीं कुछ पाता।

फसल अगर बरबाद हुई तो,

बिना मौत मर जाता।।

मानव की सेवा करके यह,

मानव धर्म निभाता।

लेकिन बदले में मानव से,

कभी नहीं कुछ पाता।।

इसके बारे में कुछ सोचो,

सत्ता को समझाओ।

श्रम-साधक सच्चे मानव का,

जीवन सफल बनाओ।।

-डा. परशुराम शुक्ल

किसान का हल

Poem On Farmer In Hindi

मैं वही किसान हूँ, 

जिसके पास है ये अतुल्य बल,

पर मेरी समस्या का नहीं, 

किसी के पास कोई भी हल।

मेहनत करता हूँ दिन-रात, 

खेत और खलिहानों में,

बिकती क्यों मेरी फसल, 

दो कौड़ी के दामों में।

किसानों पर ही क्यों, 

होती रही आज तक राजनीति,

फिर भी किसी को शर्म न आए, 

देख यह अनीति।

रोटी, कपड़ा, मकान के लिए, 

तरस रहे ये सब किसान,

राजनीति की रोटी सेक रहे हैं, 

नेता बने कुछ हैवान।

ये कैसी हमदर्दी है, 

हम किसानों से ओ नेता भाई,

घर में टीवी देख रहे हो, 

ओढ़ कर कम्बल और रजाई।

भीख नही मांग रहे हैं, 

मांग रहे बस मेहनत की कमाई,

हम किसान एक हैं, 

हिन्दू-मुस्लिम या हो सिख-ईसाई।

-सोमेश देवांगन

किसान की कहानी

Hindi Poem On Farmer

धूप तो खिली नहीं बरस रहा है पानी,

मैं हूँ किसान और यही मेरी कहानी।

मेरी फसल पड़ी हुई है मेरे खेत में,

पानी गिर रहा हैं अब इतने देर में।

मेहनत कर के फसल को है उगाया,

तेज आँधी-तूफ़ानों से इसको है बचाया।

फसल को अपने हाथों में मैंने जब पाया,

बिन मौसम ये बरसात पानी ले के आया।

धूप तो खिली नहीं बरस रहा है पानी,

मैं हूँ किसान और यही है मेरी कहानी।

-सोमेश देवांगन

किसान

Kisan Par Kavita

खून पसीना बहा-बहा कर, 

माटी में जो लादे जान।

और नहीं है वह कोई भाई, 

वह कहलाता है किसान।।

धरती माँ का है वह सच्चा लाल, 

सदा उसकी सेवा करता है‌।

हरा भरा धरती को करके सदा, 

उसको दुल्हन सा रखता है।।

क्या गर्मी क्या सर्दी बारिश,

है वह इन सबसे अनजान।

इतनी मेहनत है पर देखो, 

नहीं है इसको कोई अभिमान।।

खेत जोतता फसल उगाता, 

तब सबको भोजन मिल पाता।

अगर छोड़ दे यह करना किसानी, 

सोचो-सोचो हम सबका का क्या होता।।

-सपना यदु

मेरा किसान, मेरा अन्नदाता

Poem On Farmer In Hindi

मेहनत करने वालों से पूछों

जीवन कैसे जीते है

घोर अंधेरा छा जाये तो

दीपक कैसे बनते हैं।

अपना पेट काट-काट कर

पहले बच्चों का भरते है

मेहनत करने वालों से पूछों

जीवन कैसे जीते है।

आंधी बारिश का पता नहीं,

दिल पर पत्थर रखते है।

अपनी सोने सी फसलों को,

किस के भरोसे रखते है।

इन मेहनत करने वालों से पूछों

कैसे जीवन जीतें है।

जब जितना मिल जाये इनको

उसमें गुजारा करते है।

इन मेहनत करने वालों से पूछों,

जीवन कैसे जीते हैं?

-शाभा गहलोत

हम किसान के बेटे हैं

Poem On Farmer In Hindi

हम किसान के बेटे हैं

मिट्टी में सपने बोते हैं

पूस की ठंडी रातों में

अक्सर मेड़ों पर सोते हैं! 

हम किसान…..

तुम ए०सी० कमरों में बैठे

फसलों का मूल्य लगाते हो

बाढ़ में बह जाती फसलें

हम सब खेतों में रोते हैं! 

हम किसान…..

सावन की बौछारों से

फसलों की हरियाली है

अन्न की लालच है अपनी

हम जेठ की गर्मी सहते हैं! 

हम किसान…..

शहरी कचरों उद्योगों से

तुम प्रदूषण करते हो

जल गयी पराली थी मुझसे

उसका जुर्माना भरते हैं! 

हम किसान……

समर्थन मूल्य दिखावा है

या अपनी की लाचारी है

मूल्य मिला व्यापारी को

हम अपनी हत्या करते हैं! 

हम किसान…..

-डॉ नरेन्द्र कुमार पटेल


अन्नदाता किसान क्यों है परेशान

Poem On Farmer In Hindi

कैसे कह दूं आज ? 

मेरा भारत है महान,

मेरे भारत की शान, 

मेरा किसान है परेशान।

कहने को तो है 

धरती का भाग्य-विधाता,

परन्तु ना जाने क्यूं 

परेशान है अन्नदाता।

अपनी लगन से हम तक 

पहुंचाया दो वक्त का खाना,

आज टूट रहा है इस 

अन्नदाता का आशियाना।

हमेशा अपनी फसल के आधे भाव 

लेकर भी फिर से मेहनत करता है।

अपनी कमाई से ज्यादा उसे

औरों का पेट भरना अच्छा लगता है।

सुबह से पहले जागकर,

खुद को जिम्मेदार भारतीय 

मानकर करता है, 

मेहनत किसान ये जानकर।

भरना है मुझे सबका पेट,

न पहुंचे मेरे से किसी को ठेस।

अरे देखों ! टपक रहा जिसकी 

मेहनत का पसीना,

करता है अच्छी बारीश की कामना,

उसी का हो रहा आज कृषि बिल से सामना ।

उसने तो पूरी कोशिश की 

अपनी जिम्मेदारी निभाने की,

पर, क्यों ? आज नौबत आई, 

उसे सड़कों पे आने की।

झेल रहा है वो नये जमाने की मार,

लगा है जद्दोजद् में, मान जाये ये सरकार ।

फिर भी न जाने क्यों ? 

मन में उम्मीद नई किरण की

शायद, मांगे पूरी हो जायें 

हमारे संघर्ष और जूनून की।

कुछ ऐसे हैं किसान

जो बारी-बारी इंसाफ के खातिर 

दे रहे अपनी जान।

अब, कैसे कह दूं आज ? 

मेरा भारत है महान,

मेरे भारत की शान, 

मेरा किसान है परेशान।।

-सुमन कड़ेला

किसान

Poem On Farmer In Hindi

कहते सब मैं किसान हूं,

पर मैं देश की शान हूं,

दिन-रात करता हूं काम,

नहीं करता कभी आराम,

खेतों में ही घर है मेरा,

फसले ही है परिवार मेरा,

इनको खुशहाल देखकर,

बच्चो सा सुख मिलता है,

मन का भाव हो जाता प्रखर,

जब फसलों का फूल खिलता है।

माघ पूष जेठ आषाढ,

सब खेतों में बीत जाते हैं,

पर जब आते सूखा बाढ़,

सब फसले नष्ट हो जाते हैं।

नहीं देखता कोई हमारी ओर,

बच्चे भूखे सो जाते हैं,

देखता हूं उन महलों की ओर,

जो हमारे अनाज खाते हैं।

सब सोते अपनी शान से,

रहते सब अपनी गुमान से,

पर नहीं भरता पेट पैसों से,

जीते हैं सब इसी अनाज से।

कहते सब मैं किसान हूं,

पर मैं देश की शान हूं।

-कमल पांडेय

किसान

Poem On Kisan In Hindi

खेतों में जो डटे हुए हैं,

फसल उगाने मजदूर किसान।

कह दो उनसे जय हो तेरी,

जय जवान और जय किसान।।

प्रकृति की अजीब है माया,

कहीं धूप तो कहीं हैं छाया।

वर्षा, ग्रीष्म की अजीब कहानी,

कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाड़।।

शीत लहरी हो या हो जेष्ठ की दोपहरी,

बादल गरजे, लू चले या अंधड़ – तूफान ।

विषम परिस्थितियों में भी जो डटे रहे खेतों में हरदम,

ऐसे अन्नदाता को मेरा बारम्बार प्रणाम।।

कह दो..

सुबह हुई और निकल पड़े,

खेतों की ओर बैलों के संग।

करता मेहनत जी तोड़कर,

फर्क न पड़ता क्या शीत – बसंत ?

अर्थव्यवस्था की रीढ़ है कृषक,

कृषि ही जिसका जीवन अंत।

कर्ज में ही जीता, कर्ज में ही मरता,

कर्ज ही बना जिसकी पहचान।।

आन – बान और शान बढ़ाता,

भारत देश कृषि प्रधान।।

कह दो..

पर्व – त्यौहार आए या जाए,

सुख – दुख की पहचान नहीं।

अन्न उपजाना काम है इनका,

धन – दौलत की चाह नहीं।

खून – पसीने बहा – बहा कर,

जो करते फसलों की खेती।

कभी उपज से भर जाता घर,

कभी खेत रह जाता परती।

ऊसर में भी धान उगाते,

सरसों, गेहूं, चना उपजाते।

भूख मिटाते हर लोगों की,

उन्नति का द्योतक हलधर किसान।

आओ किसान का मान बढ़ाएं,

तभी बनेगा देश महान।।

कह दो..

-भीम कुमार


किसान पिता

Poetry On Farmer In Hindi

पिता, किसान थे

वे फसल, को ही ओढते

और, बिछाते थे।

बहुत कम-पढे लिखे

थे पिता, लेकिन गणित

में बहुत ही निपुण हो चले थे।

या, यों कह लें

कि कर्ज ने पिता

को गणित में निपुण बना दिया था।

वे रबी की बुआई

में, टीन बनना चाहते

घर, के छप्पर के लिए।

या फिर, कभी तंबू या, तिरपाल,वो

हर हाल में घर को

भींगने से बचाना चाहते थे।

घर, की दीवारें,

मिट्टी की थीं, वे दरकतीं

तो पिता कहीं भीतर से दरक जाते।

खरीफ में सोचते

रबी में कर्ज चुकायेंगे

रबी में सोचते की खरीफ में।

इस, बीच, पिता खरीफ

और रबी होकर रह जाते।

उनके सपने में, बीज, होते खाद, होता।

कभी, सोते से जागते

तो, पानी-पानी चिल्लाते।

पानी, पीने के लिए नहीं।

खेतों के लिए।

उनके सपने, पानी पे बनते

और, पानी पर टूटते।

पानी की ही तरह उनकी

हसरतें भी क्षणभंगुर होती।

उनके सपने में, ट्यूबल होता,

अपना ट्रैक्टर होता।

दूर-दूर तक खड़ी

मजबूत लहलहाती हुई फसलें होती।

बीज और खाद, के दाम

बढते तो पिता को खाना महीनों

अरुचिकर लगता।

खाद, और बीज के अलावे,

पिता और भी चिताओं से जूझते।

बरसात में जब, बाढ़

आती, वो, गांव के सबसे

ऊंचें, टीले पट चढ जाते।

वहाँ से वो देखते पूरा

पानी से भरा हुआ गाँव।

माल-मवेशी रसद, पहुँचाने, 

आए हैलिकॉप्टर

और सेना के जवान..!!

उनको, उनका पूरा

गांव, डूबा हुआ दिखता।

और, वे भी डूबने लगते

अपने गांव और, परिवार

की चिंताओं में

बन्नो ताड़ की तरह

लंबी होती जा रही थी।

उसके हाथ पीले करने हैं।

भाई, शहर में

रहकर पढता है, उसको

भी पैसे भेजने हैं।

बहुत, ही अचरज की बात है

कि, वे जो कुछ करते

अपने लिए नहीं करते।

लेकिन, वे दिनों-दिन

घुलते जातें. घर को लेकर

बर्फ, की तरह पानी मेंं।

और, बर्फ की तरह घर

की चिंता में एक दिन

ठंढे होकर रह गये पिता।

-महेश कुमार केशरी

मुश्किल में मेरा किसान

Poem On Farmer In Hindi

भारत माँ को किसानों का सलाम आ गया।

लहलहाती धरा हरियाला श्याम आ गया।।

मुश्किलों में हैं हर तरफ मेरा किसान आज।

फिर भी ये किसान कैसे मुकाम पा गया।।

प्राकृतिक आपदा, सरकारी पैगाम आ गया।

गांधी ग्रामीण भारत में कृषि धाम आ गया।।

एकता में कमी है यहां ये सभी जानते हैं पर,

प्यार के भाव से तो हर समाधान आ गया।।

रीढ़ तार इतनी ना खींचे कोई किसान की।

किसान आन्दोलन का स्वर आम छा गया।।

ना कहो कृषक को आतंकवादी अलगाववादी,

अन्नदाता है ये भारत माँ को धाम बना गया।।

हर दिन खोजता है खुशहाली किसान यहाँ,

कृषि विकास ‘पृथ्वीसिंह’ तमाम आ गया।।

-पृथ्वी सिंह बैनीवाल

कृषक दर्द कौन समझता है

Poem On Farmer In Hindi

किसान है हमारा अन्नदाता,

इसके जीवन में आराम नहीं,

कर्ज में है डूबा जीवन रहता,

ये जीवन का आयाम नही है।।

फसल उसकी विधाता ओर है,

इसको कोई समझ ना पाता है।

अन्नदाता किसान रहता भूखा,

यह प्रश्न सही में कौन उठाता है।।

पालन-पोषण मुश्किल होया,

न श्रम का मूल्य मिलता उसे है।

कांटे ही कांटे हैं उसक पथ में,

किस्मत पुष्प कब खिलता है।।

दुखी हृदय आकाश कृषक का,

मिला नहीं लक्ष्य उसे जीवन का।

निज राजनीति कंटक बनी हुई,

कैसे महकेगा ये उपवन उसका।।

‘पृथ्वीसिंह’ है पूछे कृषक का,

बताओ दर्द कौन समझता है?

नित तन-तबीयत परेशान उसकी,

यह क्यों कोई समझ ना पाता है?

-पृथ्वी सिंह बैनीवाल


महान कौन?

Poem On Farmer In Hindi

धरती पर हमे भेजता भगवान है

लेकिन धरती पर पालता किसान है

किसान है तो हम जिंदा हैं

वरना हम बेकार हैं

सबसे महान तो किसान है।

अगर वो ना होता तो

हमारा क्या होता

बिना उसके हम सब फेल हैं

देखो कुदरत का क्या खेल है

सबसे महान तो किसान है।

हम पढ़ लिख कर महान बने

सबसे बड़ा इंजीनियर तो किसान है

जिसके कारण हमारे घरों में

लगा दूध, दही, मक्खन का भंडार है

फिर भी हम कहते वो

गोबर से लिपटा अनपढ़ गवार है

हमे लगता हम सबसे महान हैं

लेकिन सबसे महान तो किसान है।

जिस के कारण हमारे घरों में बनता

दाल, चावल, फुलका (चपाती)

उसका इंजीनियर तो किसान है

वो डाक्टर भी है इंजीनियर भी है

और सबसे बड़ा कलाकार भी है

क्योंकि वो एक किसान है

सबसे महान तो किसान है

-मनजीत कौर खाक’


कृषक-हुंकार

Poem On Kisan In Hindi

खाते हो जिनका,

उन्हीं को आँख दिखाते हो।

मज़बूरियों का उनकी,

तुम बेजा फ़ायदा खुब उठाते हो।।

सौम्य, शांत देवत्व को,

कमज़ोर समझ लेते हो।

जो सीना चीर पत्थर का उपजा देते मोती,

उन्हें गरीब समझ लेते हो।।

जिनकी कठिन परिश्रम से

जगत् तृप्त होता सारा।

जिनकी सीकर से सिंचित होता

सकल लहू तुम्हारा।।

जिनकी मेहनत के दानों से

कुल तुम्हारा है पलता।

जिनकी रक्त की बूंदों से

एक नया सृष्टि है बनता।।

जिनकी एक हुंकार से

प्रलय का डंका बजता।

जिनके हल के फालों में

सृजन का गीत है रचता।।

जिनके मारे को यमदूत

कभी क्षमा नहीं करता।

जिनकी सेवा के बल से

भूतल टिका है रहता।।

जिनके बैलों के गले से,

उर्जावान मधुर घण्टी है बजता।

जिनके निश्छल मन में

अदम्य साहस है बसता।।

जिनके शांतप्रिय हृदय में

सदैव प्रेम की गंगा है बहता।

असहय कष्ट सहकर भी मन

जिनका विचलित नहीं रहता।।

उनके धैर्य-वृत्ति का,

और अधिक इम्तहान न लो।

अटल है जो अपने पथ पर,

उनका तुम बलिदान ना लो।।

प्रचंड हुए अगर वे तो,

तुम थरथर-थरथर काँपोगे।

बढ़ा क़दम जो राजप्रसाद को,

तो तुम गद्दी छोड़कर भागोगे।।

किसान अमिट अमर जवान है,

तब यह तुम भी मानोगे।

भाई-भाई पर न हथियार उठाएगा,

यह बात तुम भी जानोगे।।

दो भाई को लड़ाने में

कभी सफल नहीं हो पाओगे।

यह स्वप्न लिए मन में यूँ ही तुम,

धरा से चले जाओगे।।

नशा सत्ता का त्याग करो,

जनता अब तो जाग गयी है।

गद्दी छोड़ वनवास करो,

रणभेरी देखो बज गयी है।।

कूद पड़ो मैदान में,

वह स्वर्णिम घड़ी आ गयी है।

सत्तालोभित शत्रु का समूल-नाश

निकट आ गयी है।।

अपनी गर्जन उन्माद से,

शत्रु पर तुम वार करो।

भारी शंखनाद से,

प्रलय का शुभ आह्वान करो।।

रक्तपिपासु चंद दुष्टों का,

सिंहासन से अलगाव करो।

चिर-जनविरोधी नीति में,

अब भारी बदलाव करो।।

कृषक अब हुंकार करो, 

तुम सत्ता पर अधिकार करो।

योग्यों का सम्मान कर, 

अयोग्यों का बहिष्कार करो।।

न्याय, परिश्रम, ईमानदारी को, 

सत्ता पर विराजमान करो।

कृषक अब हुंकार करो, 

तुम सत्ता पर अधिकार करो।।

-धर्मेन्द्र कुमार


किसान

Kisan Par Kavita

रूठा हुआ मुकद्दर का 

एक सितारा सा लगता है,

जून की तपती हुई दोपहर का, 

वो उदास कुल्हाड़ा सा लगता है।

हल खेतों में चलाकर, 

जो घूमता रहा मेरे साथ हर पल।

दो बैलों के बीच झूमता, 

घुघरू का झनकारा सा लगता है।

तेरी पहचान, 

तेरी ही रोटी बन ना पायी।

तू मुझे बिन माँझी की नाव का 

पतवारों सा लगता है।।

फ़सल पकने के बाद भी, 

कौड़ी दाम की भी ना पाया।

‘मेरे जनाब’ तू मिट्टी का कच्चा सा 

एक दियाला सा लगता है।

किसान शब्द आज क्यों

तीरों से चला रही हो,

यूँ लगता है सियासती खाद,

मेरे बीजों में मिला रही हो।

मुझमें आत्मीयता ज़िन्दा बची है

अब तलक,

यूँ ही नहीं तू सुकून से

रोटी खा रही हो।

जिस रोज़ मिट्टी का नमक

अदा नहीं कर पाऊँगा,

मैं भी किसी पेड़ से लटका,

हुआ मिल जाऊँगा।

मुझे अपना लेगी मेरी मिट्टी, 

क्योंकि इसी मिट्टी का पुतला हूँ।

वक़्त मिले तो तुम अस्तित्व 

अपना भी तलाशना,

क्योंकि अब मुझे तू दर दर का,

भटका बंजारा सा लगता है।।

-पलक सचान


खेत और खलिहानों से

Poem On Farmer In Hindi

सुरभित होती सौंधी मिट्टी,

अपने सभी किसानों से.

जीवन कौशल सीखा मैंने,

खेत और खलिहानों से.

खेतों पर जो फसल उगाते,

ऐसी कृषक कहानी है.

कभी नहीं रुकते वह साथी,

जब तक दाना पानी है.

कर्म सतत ही जो करते हैं,

उनकी यहीं निशानी है.

बंजर भू को सुरभित करने,

जिसने मन में ठानी हैं.

दम्भ कपट छल भेद नहीं,

रहता इनके स्वभावों से.

जीवन कौशल सीखा मैंने,

खेत और खलिहानों से.

-डिजेन्द्र कुरै “कोहिनूर”

हे अन्नदाता ! हे अन्नदाता !

Poem On Kisan In Hindi

हे अन्नदाता ! हे अन्नदाता !

उठो जागों तुम्हें खेत बुलाता

हल तुझसे पहलें जाग गए

बैल खेतों को भाग गए

जिससें तेरा जन्मों से नाता

हे अन्नदाता ! हे अन्नदाता !

उठो जागों तेरा खेत बुलाता,

तेरी धरती क्यूँ रहेगी परती

जो तुझ पर हैं जान छिड़कती

मिट्टी पानी खर पतवार

क्यूँ रहेगी इनसे गुलज़ार

इनकों हाथों से उखाड़ फेंकता

हे अन्नदाता ! ,हे अन्नदाता !

उठो जागों तेरा खेत बुलाता

देख तुझें बहार आती हैं

बीज नया जीवन पाती हैं

फ़सलों को इंतजार तेरा हैं

हाथों का दुलार तेरा हैं

जो तेरे थाप से उछल मचाता

हे अन्नदाता ! ,हे अन्नदाता !

उठो जागों तेरा खेत बुलाता

निराई गुड़ायी साफ सफ़ा

हैं हरियाली जिनसे आ

जगत निहाल हो जाता हैं

हर प्राण शीश झुकाता हैं

फ़िर भी जो तनिक गुमान न करता

हे अन्नदाता ! ,हे अन्नदाता

उठो जागों तेरा खेत बुलाता

बातों से सरोकार नहीं हैं

किसी से भी तकरार नहीं 

परवाह किये बिना चाह के

सत्य समर्पण सेवा भाव 

जो हैं ईश्वर कहलाता

हे अन्नदाता ! ,हे अन्नदाता

उठो जागों तेरा खेत बुलाता

हे अन्नदाता ! ,हे अन्नदाता

उठों जागों तुम्हें खेत बुलाता ।।

-बिमल तिवारी”आत्मबोध”

किसान

Hindi Poem On Kisan 

तमन्नाओं की महफिल तो

हर कोई सजाता है,

पूरी उसकी होती है जो तकदीर

लेकर आता है एक वो है जो

दिन भर दूसरों की खातिर

अपने खेतों को सहलाता है,

फिर भी उसको ये जमाना

हर बार ठुकराता है

उसकी मुस्कान खेतों की

कलियों में है बसती

पर उसकी ज़िंदगी हमेशा

दुःखों में है कटती

ना किसी से कुछ कहता,

न कभी कुछ जताना

फिर भी ये ज़माना रहा है

उससे बेगाना।

ये वो है जो हमारे लिए

दिन रात मेहनत करता है,

और हम में से कोई उससे

मतलब नहीं रखता है।

कोशिशें वो भी करता है

अपनी तकदीर बदलने की

मगर कोशिश भी पूरी उसकी होती है

जो तकदीर लेकर आता है।

-सुरजीत प्रजापत

किसान

Poem On Kisan In Hindi

किसान भी

एक कलाकार है

तुम कलम से लिखते हो

तुम ब्रश से लिखते हो

वह हल-बैल

और कुदाल से लिखता है।

उसके

चावल गेहूं सरसों के दानों को देखो।

उसपर उसके

पसीने की चमक है

तुम्हे तो पद्मश्री

और न जाने

क्या क्या श्री मिलते हैं

उसे तो उसकी

कपास की फसल

बर्बाद हो जाने पर

वृक्ष पर लटकता फंदा मिलता है

कभी कलम और ब्रश से

उसकी जवानी में बूढ़ी होती

आंखों में देखो

पीढ़ी दर पीढ़ी के दर्द का

समंदर मिलेगा

कलम और ब्रश

उसकी एक कीमत है

उसका दर्द

अंबानी और अडानी के ड्राइंग रूम में

टंगा मिलता है

वह नासमझ और जिद्दी है

लेकिन जिद्द में

कांइयापन और नफ़रत नहीं है

जो तानाशाह बादशाह में है

तो आओ

कलम और ब्रश से

धान और गेहूं उगाओ

यही समय की मांग है।

के. एम. अग्रवाल

हार नहीं मानता पालनहार

Poem On Farmer In Hindi

हे! इन्द्र.. 

तुम्हारा भी स्वागत है..

इस रण क्षेत्र में

आओ तुम भी

प्रलय मचा ही लो नभ तल में

स्वीकार है..

सीने पर एक एक बूंद की प्रहार

डरा सहमा नहीं हूँ युद्ध भूमि में

कर लो जितना करना है

सर्द मौसम में भी पानी की बौछार

अब तो बंजर हो गई है छाती

चिर काल से सहते-सहते अत्याचार

तुम क्या अपनी ही तरह

समझते हो भीरू

कि रण भूमि में हार

कर लूंगा सहज स्वीकार

अनुर्वर भूमि में भी फूट पड़ता है नव अंकुर

जब निकल पड़ता हूँ

लेकर हल और कुदाल

इस हाड़ गलाती पछुआ की क्या बिसात

तन का रग-रग जानता है

कर्म पथ पर होना इससे दो चार

देखो..व्यथित मन कर चुका है बगावत

और पीठ दिखाना नहीं जानता है पालनहार…

डॉ.अजय कुमार

कृषक

Kisan Par Kavita

कृषक मिट्टी में बसता है

और मिट्टी में रमता है

अन्न की कद्र करता है

परिवार का पोषण करता है।

मिट्टी का लेपन प्रिय है उसे

जानवरों की देखभाल भी

अपनी रोटी और चारे का इंतजाम भी

सारा दिन खेतो खलिहानों में

शाम अपने मडैया की ओर

ढलते सूरज उसका समय चक्र।

पर आज का कृषक अपनी

जामीन बेचता है

मिट्टी, धूल से बचता है

एसी कूलर से खेलता है

कोठयों में विराजता है।

मिट्टी से बहुत दूर

सूरज की रोशनी पर रोक लगाने

की कोशिश में संलग्न

बड़ी मोटर गाड़ी से

अमेरिकन टोन .

बाडी गार्ड लिए

जोर से दस्तक देता है

चुनावी नेता की तरह।

दिलीप कुमार पाण्डेय

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