15+ गंगा नदी पर सुंदर कविता | Poem On Ganga River In Hindi

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Poem On Ganga River In Hindi :- दुनिया की सबसे पवित्र नदियों में से एक है गंगा नदी। समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है पंचामृत में भी गंगा को अमृत माना जाता है। हमें समझने की आवश्यकता है कि गंगा केवल जलधारा ही नहीं अपितु जनजीवन और लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग हैं।

 

poem on ganga river in hindi

 

गंगा

Poem On Ganga River

 

कल कल गीत सुनाती गंगा,

छल छल बहती जाती गंगा।

गाँव, खेत, मैदान, नगर, वन,

सबकी प्यास बुझाती गंगा।।

 

ये तो है पर्वत की बेटी,

नागिन-सी घाटी में लेटी।

वर्षा ऋतु में यही बाढ़ बन,

सब विनाश कर जाती गंगा।।

 

धोती पाप, ताप सब हरती,

हरी-भरी करती है धरती।

दर्शन-मज्जन-पान मात्र से,

मन-पावन कर जाती गंगा।।

 

करती पथ की भूमि उर्वरा,

भरती जीवन में नई त्वरा।

पग-पग इसके घाट तीर्थ हैं,

जन-जन को ललचाती गंगा।।

 

कल-कल गीत सुनाती गंगा,

छल-छल बहती जाती गंगा।

गाँव, खेत, मैदान, नगर, वन,

सबकी प्यार बुझाती गंगा।।

-बाबूलाल शर्मा 

 

भागीरथ

Poem On Ganga River

 

फिर कोई भागीरथ आए,

कब से राह निहार रही।

गंगा आज चीख रही,

गंगा आज पुकार रही।

 

सबको जीवन देने वाली,

अपनी सांसे हार रही।

फिर कोई भागीरथ आए,

कब से राह निहार रही।

 

कलयुग के इस कालखंड में,

मानव विकृतियों का शिकार।

इन लालच के मारो ने,

कितने भर दिए मुझ में विकार।

 

रो, रो के गंगा कब से,

अपनी व्यथा गुहार रही।

फिर कोई भागीरथ आए,

कब से राह निहारे‌।

 

मेरे नैसर्गिक प्रवाह को,

जगह जगह पर रोक रहे।

मेरे अमृत से जल में,

दिन पर दिन विश्व घोल रहे।

 

मंद पड़ गई नाड़ी मेरी,

करो कोई उपचार सही।

फिर कोई भागीरथ आए,

कब से राह निहार रही।

 

नगर बस्तियों का कचरा,

मुझ में कब से डाल रहे।

औद्योगिक रसायनों से,

सब मेरा रूप बिगाड़ रहे।

 

पतित पावनी कहने वाली,

अपना तारणहार निहार रही।

फिर कोई भागीरथ आए,

कब से राह नहीं आ रही।

 

गंगा आज चीख रही,

गंगा आज का पुकार रही।

-राजेन्द्र तिवारी 

 

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मैं गंगा

Poem On Ganga River

 

मैं गंगा…

इस धरा को पतित पावन बनाती,

लोगों के अनगिनत पापों को धुलाती,

सबके मुंख से गंगा ‘मां’ कहाती,

लेकिन मैं खुद हर रोज शहर की गन्दगी से नहाती।

मैं गंगा…

 

इस धरा को पतित पावन बनाती,

आदि शिव की जटाओं से आती,

तरु और तृणों की प्यास बुझाती,

लेकिन क्यों सबकी गंदगी मैं बहाती?

मैं गंगा…

 

लोग मेरे अस्तित्व को पूजते,

मुझसे अपने भूमि को सींचते,

अंततः राख बन मेरे साथ बह जाते,

लेकिन क्यों मेरे आंसुओ को नहीं देख पाते?

-नवीन कुमार सिंह

 

माँ गंगा की धारा

Poem On Ganga River In Hindi

 

मोक्षदायिनी, पतित पावनी माॅं गंगा की धारा,

सरसाती, हर्षाती धरती, छू ले जहाँ किनारा।

पुण्य दायिनी, तृप्ति दायिनी,

सबको पार उतारे।

 

शरण उसे आँचल में देती,

जो दुनिया से हारे।

निर्मल कर देती है,

मन को पापी को भी तारा।

 

प्राणदायिनी लहरें इसकी,

गीत खुशी के गाएँ।

भर देतीं उल्लास हृदय में,

ये मन को हर्षाएँ।

 

स्वर्ग लोक से धरती आईं,

भागीरथ के द्वारा।

वेगवती, चंचल पावन है,

मन को शीतल करती।

 

जीवन के संताप, पाप को,

है पल भर में हरती।

धरती पर उतरी तो,

शिव ने इसे शीश पर धारा।

 

बूंद-बूंद में इसके जैसे,

अमृत कलश भरा है।

प्रामाणिकता हुई सिद्ध है,

जल यह शुद्ध, खरा है।

 

इसके तट ने मृत्यु,

लोक से है सबको उद्धारा।

मोक्षदायिनी आज मोक्ष को

अपने जूझ रही है।

 

पाप-पुण्य की परिभाषाएँ

सबसे बूझ रही है।

पूछ रही है ऐसे होगा कब तक भला गुजारा,

पतित पावनी, पुण्य दायिनी माँ गंगा की धारा।

-मधु दीक्षित

 

मैं गंगा हूँ

Poem On Ganga River In Hindi

 

कल कल करती बहती रहती,

वसुधा को मैं सिंचित करती।

सबके पापों को धोती मैं,

पतित पावनी गंगा हूं।

मैं गंगा हूँ।

 

शिव की जटा निवास करूं मैं,

घर मंदिर में वास करूँ मैं।

सबकी जलती प्यास हरूं मैं,

सब पापों का नाश करूँ मैं,

पुण्य सलिला गंगा हूँ।

मैं गंगा हूँ।

 

गोमुख से मैं आती हूँ,

गंगासागर जाती हूँ।

वसुधा सिंचित करती रहती।

सबके पाप मैं धुलती रहती,

पुण्य प्रकाशिनि गंगा हूँ।

मैं गंगा हूँ।

-आलोक शुक्ल

 

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हे मोक्षदायिनी माँ गंगे

Poem On Ganga River In Hindi

 

गंगे मइया के दर्शन से,

तनमन पुलकित हो जाये।

मिटे सर्व तमस इस जीवन के,

नव ऊर्जा संचरित हो जाये।

 

पावन गंगधार की आभा से,

संसार उज्जवलित हो जाये।

मिले नवजीवन इस सृष्टि को,

जीवन ये सुवासित हो जाये।

 

शीतल निर्मल गंगाजल में,

मेरे हिय की भक्ति हो जाये।

रच बस जाये मन मंदिर में,

हिय उपवन पुष्पित हो जाये।

 

हे मोक्षदायिनी माँ गंगे,

जो शरण में तेरी आ जाये।

तेरे पावन जल स्पर्श मात्र,

पापों से मुक्ति मिल जाये।

-नीरजा 

 

पतित पावनी सुरसरि गंगा

Ganga River Par Kavita

 

पतित पावनी सुरसरि गंगा,

तीनों लोक में न्यारी है।

जटा विराजे शिव शंकर के,

अद्भुत वैभवशाली है।।

 

भगीरथ के भारी तप से,

भागीरथी कहाती है।

जांघ से निकली जान्हवी जी के,

जाह्नवी भी कहलाती है।।

 

मंदाकिनी भी नाम है उनका,

भरती झोली खाली है।

जटा विराजे शिव शंकर के,

अद्भुत वैभवशाली है।।

 

गोमुख से गंगासागर तक,

अमृत जल की धारा है।

धोकर पापी के पापों को,

भव सागर से तारा है।।

 

पूरे भारतवर्ष में गंगा,

जल से ही खुशहाली है।

जटा विराजे शिवशंकर के,

अद्भुत वैभवशाली है।।

 

अपरम्पार है माँ की महिमा,

वेद पुराण भी गाते है।

जो भी मां की शरण मे जाये,

बिन मांगे सब पाते है।।

 

करें आरती ‘शिखा’ हृदय से,

गंगा छवि निराली है।।

जटा विराजे शिवशंकर के

अद्भुत वैभवशाली है।।

-शिखा श्रीवास्तव

 

गंगा

Ganga River Par Kavita

 

सदियों से अविरल बह कर के,

अमर तरंगिनी मैं हूँ गंगा।

निकल कमंडल से ब्रह्मा के,

सुरपथ गामिनी मैं हूँ गंगा।।

 

शंकर जी के जटा में उलझी,

जटा शोभिनी मैं हूँ गंगा।

भागीरथ के तप से आई,

पतित पावनी मैं हूँ गंगा।।

 

देकर मोक्ष सगर पुत्रों को,

मोक्ष दायिनी मैं हूँ गंगा।

धरती की हरियाली हमसे,

जीवन दायिनी मैं हूँ गंगा।।

 

धोती सारे पाप धरा के,

पाप नाशिनी मैं हूँ गंगा।

तीन लोक के सम्वर्धन हित,

त्रिपथ गामिनी मैं हूँ गंगा।।

-महेश चन्द्र गुप्त

 

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गंगा की महिमा

Ganga River Par Kavita

 

कितना पावन कितना निर्मल,

माता प्यारी गंगा है।

निकली विकट पहाड़ों से,

जिसमे नहा मन चंगा है।

 

शिव की जटा से निकली सुरसरि,

भगीरथ के तप से।

तारण हारे हरि की कृपा से,

बनी मंदाकिनी जप से।

 

कपिल मुनि के श्राप से,

मुक्ति देने पहुंची माता बंगा है।

कितना पावन कितना निर्मल,

माता प्यारी गंगा है।

 

जंगल झाड़ पहाड़ों से,

मैदानों में निर्मल बहती है।

जीव जंतु मानव के हिय में,

सदा बसी वो रहती है।

 

जल से सिंचित खेती धन-धान्य,

नही सुलाती भूखा नंगा है।

कितना पावन कितना निर्मल,

माता प्यारी गंगा है।

 

बने तीर्थ जिनके तट-पर,

हरिद्वार, प्रयाग काशी है।

गंगा-सागर जहाँ नहाकर,

मुक्ति पाते देशवासी है।

 

रोग व्याधि से मुक्त करें,

जो काया कंचन चेतन जंगा है।

कितना पावन कितना निर्मल,

माता प्यारी गंगा है।

-डॉ. सुभाष चंद रसिया

 

मैं गंगा हूं

Poem On Ganga River In Hindi

 

ऋषि मुनियों का देवालय हूँ,

मैं संस्कृति का विद्यालय हूँ।

हरी की पेढ़ी से गागर तक,

गोमुख से गंगा सागर तक।

मैं उद्धारक मानवता की,

निर्मलता की पावनता की।

सबकी झोली भर देती हूं,

सब कष्टों को हर लेती हूं।

जन गण मन विश्व तिरंगा हूँ,

मैं गंगा हूँ ….मैं गंगा हूँ।

 

मैं देवनदी अलबेली हूँ,

शिव के मस्तक पर खेली हूँ।

सुर सरिता बनकर लेटी हूँ,

हिमगिरि की प्यारी बेटी हूँ।

श्री मुख की अमृत वाणी हूँ,

मैं सागर पुत्र कल्याणी हूँ।

सबकी पीड़ा का ज्ञाता है,

भागीरथ भाग्य विधाता है।

नन्दीश्वरी धुवनन्दा हूँ,

मैं गंगा हूँ….मैं गंगा हूँ।।

 

कवि वाल्मीकि हर्षाया है,

तुलसी ने मुझको गाया है।

कहता सरयू का पानी है,

मेरी भी राम कहानी है।

देवी बन बैठी दासी हूँ,

मैं भी जन्मों से प्यासी हूं।

सबके प्राणों को धोती हूं,

अपनी हालात पर रोती हूं।

आँचल आंसू सतरंगा हूं,

मैं गंगा हूं….मैं गंगा हूं !!

 

अब तो दुविधा में जीती हूं,

अमृत देकर विष पीती हूं।

बिखरी मोती की माला है,

मुझको घायल कर डाला है।

बुझते दीपों की बाती है,

आंखें मेरी भर आती है।

सबके तन मन को शुद्ध किया,

मुझको लोगों ने अशुद्ध किया।

सरिता का एक पतंगा हूं,

मैं गंगा हूं ….मैं गंगा हूं !!

 

सुख सुविधा पर होकर सवार,

तट पर आ बैठा हरिद्वार।

सिंचित करती कितने प्रदेश,

मेरी बाहों में ऋषिकेश।

मुझको छू लो मैं पारस हूँ,

मैं उजली भोर बनारस हूं।

इस तपोभूमि की वासी हूं,

मैं ही तो उत्तर काशी हूं।

बद्री का नाथ पतंगा हूं,

मैं गंगा हूं ….मैं गंगा हूं।।

 

पुण्यों का फल चखना होगा,

तो याद मुझे रखना होगा।

जीवन की पात झरि होगी,

मुंह मे दो बूंद मेरी होगी।

स्वर्गीय सुखों की धारक हूं,

पृथ्वी पर पाप निवारक हूं।

अंतिम क्षण मुझ तक जो आया,

बैकुंठ स्वयं उसने पाया।

नव प्राणों में नव रंगा हूं,

मैं गंगा हूं….मैं गंगा हूँ।।

-अजातशत्रु

 

नमामि गंगे

Ganga River Par Kavita In Hindi

 

देवभूमि से दिव्य धाम तक,

निर्मल जल अविरल रहता है।

भागीरथ के तप का प्रतिफल,

यह पावन गंगा जल बहता है।

 

रजत देह है चंद्र किरण सी,

श्वेत शिला तट तरुवर छाए।

सतत् सनातन संस्कृति पलती,

घाट घाट है शीश झुकाए।

 

आर्यावर्त की उज्जवल धरती,

पाप विसर्जित कर, दे मुक्ति।

ब्रह्मा जी के शक्ति कमंडल,

से निकली अतुलित भव भक्ति।

 

तत्व ज्ञान अंजुरी में भरकर,

नभ तक जाएं वेद ऋचाएं।

अहं ब्रह्म लिखती लहरों पर,

करे आचमन दसों दिशाएं।

 

तू पतित पावनी, मोक्षदायिनी,

भस्म मेरी जल मे घुल जाए।

हो जन्म मरण के बंध विसर्जित,

आत्मलीन तुझ में हो जाए।

-डॉ ममता श्रीवास्तव

 

पतित पावनी गंगा

Poem On Ganga River In Hindi

 

अचिन्त्य रूप तेरा अतिपावन,

जयतु जयतु जय हे गंगे माँ।

करत निहाल तुरत-फुरत में,

पाप-सिन्धु धवलित कुरु क्षण में।

 

अवगाहन तन रसना लिप्सित,

पीयूषधारिणी जय गंगे माँ।

अचिन्त्य रुप —

जयतु जयतु जय हे गंगे माँ।।

 

विप्लवनाशिनी पतितोद्धारिणी,

आत्मप्रकाशन जग करती,

अवतरित धरा तू जनहितकरिणी,

त्रिपथगामिनी जय गंगे माँ।

 

अविरलरुपा चित्तपाविनि,

जयतु जयतु जय हे गंगे माँ।

अचिन्त्य रूप–,

जयतु जयतु जय हे गंगे माँ।।

 

जन्हु सुता हरिपद निगमित,

नीलकंठ शीर्ष पे निवसित।

उत्थित उमगित हिम अचंभित,

यथा धरणि युत माल विभूषित।

 

ब्रम्ह कमंडल शोभित माते,

अजस्त्र सहस्र नमन गंगे माँ।

अचिन्त्य रुप—,

जयतु जयतु जय हे गंगे माँ।।

 

सुर, असुर, खग, पशु, जन सेवित,

पोषित करती मातु वत्सले।

मोक्षदायिनी तापनिवारिनि,

हर हर गंगे, हर हर अम्बे|

 

पुलकित, पुष्पित धरा, गगन ये,

आर्य संस्कृति सिंचित गंगे।

अचिन्त्य रूप……..,

जयतु जयतु जय हे गंगे माँ।।

-डॉ. शेषधर त्रिपाठी

 

गंगा

Poem On Ganga River In Hindi

 

सभी की भावनाओं का,

स्वच्छ अभियान है गंगा।

कभी जो रूक नहीं पाता,

वो अनुसंधान है गंगा।

 

नमन उनको लगे हैं,

जो प्रदूषण मुक्त करने में,

उन्ही की साधनाओं का,

सफल वरदान है गंगा।

 

अमृत पान करो गीता का तो,

जीवन प्रांजल होगा।

चमक रहेगी नयनो में,

और भाव वेग निश्छल होगा।

 

हर पल गीत रहेगा,

जीवन श्वास श्वास सुरभित होगी।

जितने प्रश्न उठ रहे मन में,

उन सबका शुभ हल होगा।

 

जटा मध्य से निकली गंगा,

गीता श्री मुख से आयी।

कल कल की धुन एक सहेजे,

एक कन्हैया ने गाई।

 

एक छू रही भू को है तो,

एक जिन्दगी के पन्ने।

दोनों ही प्रणम्य हैं,

जग में दोनों ही मेरी माई।

-बलराम श्रीवास्तव

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गंगा

Poem On Ganga River In Hindi

 

गंगा की कल-कल धारा,

कहती तू रुक जा रे।

मैं कहती गंगा तू बहती जा रे,

तट है, तेरा बड़ा निराला।

 

बहती जिसमें निर्मल धारा,

धाराएँ बहती जाती हैं।

तू कभी नहीं रुक पाती है,

लहरें कुछ गुन-गुन गाती हैं।

 

महिमा पर कुछ इतराती है,

पदनख की याद दिलाती हैं।

तेरी पावन गरिमामय स्वर में,

अपना राग मिलाती हैं।

 

मैं श्रांत पाथिनी हास-त्रास में,

जीवन ढोती चलती हूँ।

करती हूँ नमन, पुण्य सलिल,

अपराध बोध दुहराती हूँ।

 

मेरी कुंठा में पतित पावनी,

तुम मत अपना झाग भरो।

बहती जाओ सागर तट में,

सागर में सलिल सुहाग भरो।

 

तेरे तट पर मानव संतति,

कृति गाथा गाएगी।

निर्मल जल में तन-मन धोकर,

मानवता फिर इतराएगी।

-वंदना वात्स्यायन

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