9+ हिमालय पर्वत पर कविता | Poem On Himalaya Mountain In Hindi

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Poem On Himalaya Mountain In Hindi :-

 

Poem On Himalaya In Hindi

 

 

हिमालय

Poem On Himalaya

युग-युग से है अपने पथ पर,

देखो, कैसा खड़ा हिमालय।

डिगता कभी न अपने प्रण से,

रहता प्रण पर अड़ा हिमालय।

खड़ा हिमालय बता रहा है-

डरो न आँधी पानी में।

डटे रहो सब अपने पथ पर,

कठिनाई तूफ़ानी में।

डिगो न अपने प्रण से, तो

सब कुछ पा सकते हो प्यारे।

तुम भी ऊँचे हो सकते हो,

छू सकते हो नभ के तारे।

अचल खड़ा जो अपने पथ पर,

लाख मुसीबत आने में,

मिली सफलता जग में उसको

जीने में, मर जाने में।

-सोहनलाल द्विवेदी

हिमालय

Poem On Himalaya In Hindi

ऊँचे हैं, नीचे हैं पर्वत,

मगर हिमालय अपना।

देख रहा है अब भी बढ़ते,

जाने का ही सपना।

सभी पर्वतों से बढ़कर है,

नभ को जाकर छूता‌।

किस पर्वत में है हिमगिरि से,

ऊँचे जाने का बूता।

सूरज धरती से भी पहले,

इसको है चमकाता।

चंदा भी इस पर ही किरणें,

पहले है बिखराता।

कई-कई नदियों का घर है,

उससे हैं ये आती।

अमृत जैसा अपना ये हैं,

मीठा पानी लातीं।

सुंदर हरियाली को अपने,

सिर पर धरे हुए है।

जाने कितने गुण पर्वत,

अपने में भरे हुए है।

गौरव इसका अब बढ़ने से,

कभी न रुकनेवाला।

भारत का यह ऊँचा मस्तक,

कभी न झुकनेवाला।

-श्रीप्रसाद

हमारा पहाड़ हिमालय 

 Poem On Himalaya Mountain In Hindi

हमारा पहाड़ हिमालय है,

यह औषधियों का आलय है।

यहाँ गिरते हिम और पाला,

सूरज करता यहाँ उजाला।

भारत का यह ताज है,

यहाँ न आएं आँच है।

ऋषियों की यह भूमि है,

शंकर का यह वास है।

यहाँ से निकले पावन गंगा,

भारत देश है रंग-बिरंगा।

ग्रीष्म में आती है यहाँ बाढ़,

फूलों से लद जाते हैं पहाड़।

हमारा पहाड़ हिमालय है,

यह औषधियों का आलय है।

यह करता है भारत में बरसात,

वर्षाऋतु में आती है, यहाँ घास,

यहाँ पर रहते लोग सुखी,

न होता यहाँ कोई दुःखी।

मौसम अच्छा रहता है,

सबका ही मन रमता है।

हमारा पहाड़ हिमालय है,

यहा औषधियों का आलय है।

-गौरव वर्मा

यह है भारत का शुभ्र मुकुट

Poem On Himalaya Mountain In Hindi

यह है भारत का शुभ्र मुकुट,

यह है भारत का उच्च भाल।

सामने अचल जो खड़ा हुआ,

हिमगिरि विशाल, गिरिवर विशाल।

कितना उज्ज्वल, कितना शीतल,

कितना सुन्दर इसका स्वरूप?

है चूम रहा गगनांगन को,

इसका उन्नत मस्तक अनूप।

है मानसरोवर यहीं कहीं,

जिसमें मोती चुगते मराल,

हैं यहीं कहीं कैलास शिखर,

जिसमें रहते शंकर कृपाल।

युग युग से यह है अचल खड़ा,

बनकर स्वदेश का शुभ्र छत्र।

इसके अँचल में बहती हैं,

गंगा सजकर नवफूल पत्र।

इस जगती में जितने गिरि हैं,

सब झुक करते इसको प्रणाम।

गिरिराज यही, नगराज यही,

जननी का गौरव गर्व–धाम।

इस पार हमारा भारत है,

उस पार चीन–जापान देश।

मध्यस्थ खड़ा है दोनों में,

एशिया खंड का यह नगेश।

सोहनलाल द्विवेदी

मेरे नगपति! मेरे विशाल हिमालय

Poem On Himalaya Mountain In Hindi

मेरे नगपति! मेरे विशाल,

साकार, दिव्य, गौरव विराट।

पौरुष के पूंजीभूत ज्वाल,

मेरी जननी के हिम-किरीट।

मेरे भारत के दिव्य भाल,

मेरे नगपति! मेरे विशाल।

युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त,

युग-युग शुचि, गर्वोन्नत, महान।

निस्सीम व्योम में तान रहा,

युग से किस महिमा का वितान?

कैसी अखंड यह चिर समाधि,

यतिवर! कैसा यह अमिट ध्यान?

तू महाशून्य में खोज रहा,

किस जटिल समस्या का निदान?

उलझन का कैसा विषम जाल,

मेरे नगपति! मेरे विशाल।

ओ, मौन तपस्या-लीन यती !

पल भर को तो कर दृगुन्मेश !

रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल

है तड़प रहा पद पर स्वदेश।

सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,

गंगा, यमुना की अमिय धार

जिस पुण्यभूमि की ओर बही

तेरी विगलित करुणा उदार।

जिस के द्वारों पर खड़ा क्रांत

सीमापति! तू ने की पुकार,

पद-दलित इसे करना पीछे

पहले ले मेरा सिर उतार।

उस पुण्यभूमि पर आज तपी

रे, आन पड़ा संकट कराल

व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे

डंस रहे चतुर्दिक विविध व्याल।

मेरे नगपति! मेरे विशाल?

कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा

कितना मेरा वैभव अशेष!

तू ध्यानमग्न ही रहा, इधर।

वीरान हुआ प्यारा स्वदेश!

किन द्रौपदियों के बाल खुले?

किन-किन कलियों का अंत हुआ?

कह ह्रदय खोल चित्तौर ! यहाँ।

कितने दिन ज्वाल वसंत हुआ?

पूछे सिकता-कण से हिमपति,

तेरा वह राजस्थान कहाँ?

वन-वन स्वतंत्रता-दीप लिए।

फिरने वाला बलवान कहाँ?

तू पूछ अवध से राम कहाँ?

वृंदा! बोलो घनश्याम कहाँ ?

ओ मगध! कहाँ मेरे अशोक?

वह चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ?

पैरों पर ही है पड़ी हुई

मिथिला भिखारिनी सुकुमारी

तू पूछ कहाँ इस ने खोयीं

अपनी अनंत निधियां सारी?

री कपिलवस्तु! कह, बुद्धदेव

के वे मंगल उपदेश कहाँ?

तिब्बत, ईरान, जापान, चीन

तक गए हुए सन्देश कहाँ?

वैशाली के भग्नावशेष से

पूछ लिच्छवी-शान कहाँ?

ओ री उदास गण्डकी! बता

विद्यापति कवि के गान कहाँ ?

तू तरुण देश से पूछ अरे,

गूंजा यह कैसा ध्वंस-राग?

अम्बुधि-अंतस्तल-बीच छिपी

यह सुलग रही है कौन आग?

प्राची के प्रांगण बीच देख,

जल रहा स्वर्ण-युग-अग्नि-ज्वाल

तू सिंहनाद कर जाग तपी!

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,

जाने दे उन को स्वर्ग धीर,

पर फिरा हमें गाण्डीव-गदा

लौटा दे अर्जुन-भीम वीर!

कह दे शंकर से आज करें

वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार

सारे भारत में गूँज उठे

‘हर-हर-बम’ का फिर महोच्चार

ले अंगड़ाई, उठ, हिले धरा,

कर निज विराट स्वर में निनाद,

तू शैलराट! हुंकार भरे

फट जाए कुहा भागे प्रमाद!

तू मौन त्याग, कर सिंहनाद,

रे तपी! आज तप का न काल

नव-युग-शंखध्वनि जगा रही

तू जाग, जाग, मेरे विशाल!!

रामधारी सिंह दिनकर

 

 

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