10+ झरना पर कविता | Poem On Waterfall In Hindi

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Poem On Waterfall In Hindi :- झरने का काम है बहना, आगे बढ़ना, रास्ते में पड़े पत्थरों को धकेलकर आगे बढ़ना। हमें भी अपने जीवन में आनेवाली बाधाओं को दूर करते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। इस कविता में झरना अपनी कहानी किस प्रकार कहता है

 

Poem On Waterfall In Hindi

 

झरना

Poem On Spring In Hindi

झर-झर,झर-झर झरना बहता

ठंडा-ठंडा पानी,

आओ बच्चो, तुम्हें सुनाऊँ

अपनी राम कहानी।

मेरा जन्म हुआ था ऊँचे

पर्वत की चोटी पर,

एक रोज़ जब शिला बर्फ की

धम से गिरी पिघलकर।

रुक न सका मैं माँ की गोदी में

चला सैर करने को,

माँ चिल्लाती रही दूर से

कहाँ चला मरने को?

लेकिन बड़े-बड़े पत्थर मैं

ठोकर मार गिराता,

रहा हमेशा आगे बढ़ता

बस चलता ही जाता।

आ पहुँचा हूँ आज जहाँ तुम

मुझको देख रहे हो,

मेरे पाँवों पड़े हुए हैं

पत्थर नहीं बहे जो।

पर न रुकूँगा, नहीं रुकूँगा,

मैं चलता जाऊँगा,

पथ की बाधाएँ ठुकराकर

बढ़ता ही जाऊँगा।

तुम्हें छोड़कर यहीं, और मैं

आगे बढ़ जाऊँगा,

पीछे मुड़कर तुम्हें देखने

लौट नहीं आऊँगा।

-निरंकार देव सेवक

झरना

Poem On Waterfall In Hindi

कल-कल करता झरना बहता,

बहते-बहते सबसे कहता।

मुश्किलों से मत घबराओ,

रुको नहीं, तुम चलते जाओ।

 

झरना

Poem On Spring

झर-झर बहता जाए झरना,

बात हमें बतलाए झरना।

आगे हम बढ़ते ही जाएँ,

कभी न पीछे वापस आएँ,

आगे जो पत्थर टकराएँ।

उसको भी हम पार कर जाएँ,

कभी न भय से वही रुक जाएँ,

साहस से आगे बढ़ जाएँ।

हो चाहे कितनी भी कठिनाई,

कभी भी न हम हारे ओ भाई,

निडर व्यक्ति वही कहलाएँ।

जो साहस से आगे बढ़ते जाएँ,

झरने जैसे बहते जाएँ.

झरना हमें यही सिखलाएँ।

झर-झर बहता जाए झरना

सदा हमें बतलाए झरना।

-रौशनी

बढता झरना

Poem On Spring In Hindi

उतर उतर कर पर्वत पर्वत

कल-कल, छल-छल गाता झरना

आगे-आगे बढ़ता झरना।

कदम कदम पर ठोकर खाता

फिर अपना वह राह बनाता

आगे-आगे बढ़ता झरना।

नई उमंगें लेकर चलता

चट्टानों से भी वह लड़ता

हिम्मत लेकर बढ़ता झरना।

बाधाओं से ना घबराता

प्रगति पथ पर कदम बढ़ता

आगे-आगे बढ़ता झरना।

-सतीश चन्द्र भगत

गिरता झरना

Poem On Spring In Hindi

धरा पर गिरता झरना,

मैं देख रहा किनारे से।

मन्द-मन्द गिर रही रिमझिम धारा,

एक-एक बूंद में कई-कई बुलबुले,

उठ रहे साथ, उड़ रहे साथ

लग रहा ऐसा, मानो तपन हो पानी

मेरा मन उन्हें पकड़ने को आतुर

मैं गया उनके पास,

कुछ ही पकड़ पाया।

हुआ इतना जरूर कि मैं

उन्हें कुछ ही स्पर्श कर पाया

इतने ही स्पर्श ने

खुशी महसूस करायी।

फिर भी मैं, फिर से मैं

धरा पर गिरता झरना,

मैं देख रहा किनारे से।

-अनूप बसर

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