Top 23+ Best Short Poem On River In Hindi | नदी पर सुंदर कविता

Poem On River In Hindi :- इस आर्टिकल में आप सभी को बताने जा रहा हूं नदी पर कविता ( Nadi Par Kavita) नदी पर जो कविता है वह नदी की हि जुबानी है यानी नदी अपने जीवन की सारी कहानी इस कविता के माध्यम से बताई जा रही है।

 

नदियाँ

Poem On River In Hindi

 

नदियाँ गाती सुन्दर गाना,

क्यों ना हम उनसे ये सीखें।

 

कल-कल करती गीत सुनाती,

दिन-रात हरदम वों गाती।

 

जात-पात का धर्म मिटाकर,

सब जीवों की प्यास बुझाती।

 

बून्द-बून्द बारिश का लेकर,

नदियों से सागर बन जाती।

 

निर्मल, शीतल जल धारण कर,

शीतलता का पाठ पढ़ाती।

 

चट्टानों से हरदम लड़ती,

अपनी राहे खुद वो गढ़ती।

 

कभी ना रुकती, कभी ना झुकती,

अपनी मंजिल तक वों चलती।

-प्रीतम कुमार साहू

 

नदियाँ

Poem On River In Hindi

 

कलकल कलकल इठलाती जाती,

निर्मल नदिया की धार।

हर चुनौती को स्वीकार करती,

वो नहीं मानती कभी हार।

 

अविरल बढ़ते जाती अपने पथ पर,

करती बाधाओं को पार।

दिखाती रौद्र रूप अपना,

जब हम करते प्रकृति से छेड़छाड़।

 

जीवनदायिनी माता हैं नदियाँ,

करती धरा का सुंदर श्रृंगार।

शीतल जल से प्यास बुझाती,

इनसे ही है हरा-भरा ये संसार।

-अनिता चंद्राकर

 

नदियाँ

Poem On River In Hindi

 

सुनो मेरे धरती के वासी,

मैं कल-कल करती नदियाँ हूँ।

 

तुम मुझसे मैं तुमसे जुडी,

इस मिट्टी का अंग मैं भी हूँ।

 

मांग रही मैं तुमसे जीवन,

जो तुमको जीवन देती हूँ।

 

ना सताओ मुझको तुम,

ऐसे मुझे बहने दो।

 

उसी धार पर मुझे जा मिलना है,

मुझ पर थोड़ा सा उपकार कर।

 

पहाड़ों की चोटियों से,

मैं रास्ते खुद ही बनाती हूँ।

 

आकर तुम्हारे गलियों में,

मैं बांधों से बंध जाती हूँ।

 

कारखानों के काले रंग,

आकर मुझसे लिपट जाते हैं।

 

बेजुबान मासूम जानवर,

उसे पीकर मर जाते हैं।

 

गलतियाँ तुम करते हो,

दोष मुझ पर लगाते हो।

 

इस सुन्दर धरती की,

जल धारा मैं नाम हूँ।

 

सुनो मेरे धरती के वासी

मैं ही गंगा-यमुना चारों धाम हूँ।

-सरिता माही

 

नदियाँ

Poem On River In Hindi

 

कलकल बहती जाती नदियाँ।

जानें बीती कितनी सदियाँ।।

 

मीठा जल भरकर ये लाती।

जनजीवन खुशहाल बनाती।।

 

और बाढ़ जब-जब भी आए।

मिट्टी को उपजाऊ बनाए।।

 

मिलता सबको निर्मल पानी।

नदियों से ही है जिनगानी।।

 

अति उपयोगी जल की धारा।

जीव जंतु का यही सहारा।।

-कन्हैया साहू

 

नदी

Poem On River

 

क्या है पता तुम्हारा?

कौन पिता है, कौन है माता,

कितनी बहने, कितने भाई?

 

लहरें भी क्या ये सारी ही,

साथ तुम्हारे आई।

 

बहती ही जाती हो नदिया,

थोड़ी देर ठहर जाओ।

 

नदिया बोल पड़ी और कहती है-

मैं गंगा हूँ, जमुना हूँ।

 

ब्रह्मपुत्र, झेलम, सतलूज हूँ।

कावेरी हूँ, कृष्णा हूँ।

 

जो तुम रख दो नाम वही मैं,

बन जाती हूँ बेटे।

 

सबको सुख पहुँचाती चलती,

हर्षाती हूँ बेटे।

 

बोला बालक सूख न जाना,

बाढ़ नहीं तुम लाना।

 

करती हो उपकार सभी का,

सागर में मिल जाना।।

-मंजु दवे

 

मैं नदी हूं

Poem On Nadi In Hindi

 

नदी हूं मैं नदी हूं,

हरदम बहती रहती हूं,

सुनो बात मेरी अनोखी नदी हूं।

 

पहाड़ों से जन्म लिया,

जा सागर में मिल जाती हूं।

नदी हूं मैं नदी हूं,

हरदम बहती रहती हूं।

 

जहां जन्म लिया कभी न मुड़कर देखा,

सृष्टि की ग़ज़ब कहानी हूं।

न जाने कैसे राहों में भी,

रेत-कंकरीले,चट्टानों से भी,

टकराती बह जाती हूं।

नदी हूं मैं नदी हूं,

हरदम बहती रहती हूं।

 

कई नामों से पुकारा मुझे,

ना जाने कितने नाम है मेरे।

कहीं गंगा, कहीं यमुना,

कृष्णा, कावेरी, गोदावरी और सरस्वती,

ना जाने कितने नाम है मेरे।

कल -कल करती, झर- झर करती,

चट्टानों से खेला करती।

हरदम बहती रहती हूं,

नदी हूं मैं नदी हूं।

हरदम बहती रहती हूं।

 

मुझसे ही तृप्त हुई यह धरती,

हरी-भरी मेरे जल से हो जाती है।

मुझसे ही कितने कल-कारखाने,

अपना उत्पादन बढ़ाते हैं।

हर जीव-जंतु ने मुझसे ही जीवन पाया,

नदी हूं मैं नदी हूं।

हरदम बहती रहती हूं।

 

मुझसे ही प्यासों ने पानी पाया,

पानी से ही सब जीते हैं।

न जाने कब से पानी है, तब से यह नदी है,

यह नदी की कितनी बड़ी कहानी है।

नदी हूं मैं नदी हूं,

हरदम बहती रहती हूं।

-वसुन्धरा कुरै

 

जय नदी जय हिंद

Nadi Par Kavita

 

नदियों की है महिमा भारी,

लगती धारा निर्मल प्यारी।

 

कंचन जल कलकल है बहता,

जीवन चलना हमसे कहता।

 

गंगा यमुना पावन नदियाँ,

सींचे धरती सदियाँ सदियाँ।

 

शाम सबेरे पूजन होता,

जलती मैया की है ज्योति।

 

चढ़ता चाँदी, पैसा, सोना,

और मिठाई भर भर ढो़ना।

 

जय गंगा नर्मदा कावेरी,

युगों युगों से महिमा तेरी।

-स्नेहलता “स्नेह”

 

नदियाँ

River Par Poem

 

कलकल करती नदियाँ बहती, 

झरझर करते झरने।

मिल जाती हैं सागर तट में, 

लिये लक्ष्य को अपने।।

 

सबकी प्यास बुझाती नदियाँ,

मीठे पानी देती।

सेवा करती प्रेम भाव से,

कभी नहीं कुछ लेती।।

 

खेतों में वह पानी देती,

फसलें खूब उगाते।

उगती है भरपूर फसल तब,

हर्षित सब हो जाते।।

 

स्वच्छ रखो सब नदियाँ जल को,

जीवन हमको देती।

विश्व टिका है इसके दम पर,

करते हैं सब खेती।।

 

गंगा यमुना सरस्वती की,

निर्मल है यह धारा।

भारत माँ की चरणे धोती,

यह पहचान हमारा।।

 

विश्व गगन में अपना झंडा,

हरदम हैं लहराते।

माटी की सौंधी खुशबू को,

सारे जग फैलाते।।

 

शत शत वंदन इस माटी को,

इस पर ही बलि जाऊँ।

पावन इसके रज कण को मैं,

माथे तिलक लगाऊँ।।

-महेन्द्र देवांगन माटी

 

नदी हूँ नदी हूॅं

River Par Kavita

 

नदी हूँ नदी हूँ

पहाड़ो की बिटियाँ

प्रपातों में खेली

उछलकर हवाओं

से आंख मिचौली

कही शांत निर्जन

कही भीड़ भारी

हरे खेत खलिहान

बनकर खुशहाली

मैदान तट पर मैं

आगे बढ़ी हुँ।

नदी हूँ, नदी हुँ।

 

कितने अडंगे

रुकावट है भारी

बने राह रोड़ा

मेरी इस सवारी

मगर मैं उलझन

से भिड़कर बढ़ी हूँ

खुशहाल जन -मन

मैं करती चली हुँ।

नदी हुँ, नदी हुँ।

 

वो गन्दा सा नाला

वो नन्ही सी नदियां

बाँधे सरोवर

कही ताल, तरिया

छोटा, बड़ा न

कोई भेद इनसे

सब है सहायक

सुख-दुख के संगी

सागर के राहों में

ज्यों-ज्यों बढ़ी हुँ।

नदी हूँ, नदी हूँ।

 

समय के फलक पर

जो इतिहास बीता

कोई युद्ध हारा

किसी ने है जीता

संस्कृति अनेकों

सभ्यता समेटे

मेरे तट की घटना

वो विस्मृत अवशेषें

समेटे मैं चुपचाप

साक्षी बनी हुँ।

नदी हूँ, नदी हुँ।

द्रोण कुमार सार्वा

 

 

नदियाँ

Poem On River

 

कल -कल छल-छल बहती नदियाँ।

मधुर गीत सुनाती नदियाँ।।

 

बच्चे इसमें खूब नहाए।

क्या बूढ़े और क्या जवान।।

 

तेरे ही इस शीतल जल से।

खेती करते हैं किसान।।

 

तू है पावन और तू सदा पवित्र कहाए।

कार्तिक मास में प्रातः काल, 

दीपक तुझमें लोग बहाए।।

 

गंगा, यमुना, सरस्वती तेरे हैं अनेकों नाम।

तेरे जल में डुबकी लगाकर, 

तीर्थयात्री करें प्रणाम।।

 

तेरा दृश्य है सुंदर और तू है सबको भाती।

बहते बहते तू अंत में 

सागर में जाकर मिल जाती।।

सपना यदु

 

 

नदियाँ

Poem On River In Hindi

 

कलकल बहती जाती नदियाँ।

जानें बीती कितनी सदियाँ।।

 

मीठा जल भरकर ये लाती।

जनजीवन खुशहाल बनाती।।

 

और बाढ़ जब-जब भी आए।

मिट्टी को उपजाऊ बनाए।।

 

मिलता सबको निर्मल पानी।

नदियों से ही है जिनगानी।।

 

अति उपयोगी जल की धारा

जीव जंतु का यही सहारा।।

कन्हैया साहू ‘अमित’

 

 

नदी

Poem On River In Hindi

 

पहाड़ से उतरकर

लड़खड़ाती डगमगाती,

बहती चली जाती।

 

निश्छल कलकल

रजत सी धवल

प्यारी सी जलधारा।

 

देखो कैसी नटखट

नटनी सी चटपट

पासे बदलती,

 

चट्टानों पर उछलती

चली जा रही यह

धरती को,

 

हरित वसन

पहनाने

तनिक न घबराये।

 

बस चलती जाये

डरो न राही ,

यह है सिखाये।

सुधा मिश्रा द्विवेदी

 

 

छोटी सी हमारी नदी

Nadi Poem In Hindi

 

छोटी-सी हमारी नदी टेढ़ी मेढ़ी धार,

गर्मियों में घुटने भर भिगों कर जाते पार।

पार जाते ढोर-डंगर , बैलगाड़ी चालू ,

ऊँचे हैं किनारे इसके, पाट इसका ढालू।

 

पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, 

काँस फूले एक पार ऊजले जैसे धाम।

दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार,

रातों को हुआँ-हुआँ कर उठते सियार।

 

अमराई दूजे किनारे और ताड़-वन,

छाँहों-छाँहों बाम्हन टोला बसा है सघन

कच्चे-बच्चे धार-कछारों पर उछल नहा लें,

गमछों-गमछों पानी भर-भर अंग-अंग पर ढालें।

 

कभी-कभी वे साँझ-सकारे निबटा कर नहाना,

छोटी-छोटी मछली मारें आँचल का कर छाना।

बहुएँ लोटे-थाल माँजती रगड़-रगड़ कर रेती,

कपड़े धोतीं, घर के कामों के लिए चल देती।

 

जैसे ही आषाढ़ बरसता, भर नदिया उतराती,

मतवाली-सी छूटी चलती तेज धार दन्नाति।

वेग और कलकल के मारे उठता है कोलाहल,

गँदले जल में घिरनी-भँवरी भँवराती है चंचल।

दोनों पारों के वन-वन में मच जाता है रोला,

वर्षां के उत्सव में सारा जग उठता है टोला।

 रवींद्रनाथ टेगौर 

 

 

नदी नदी

Poem On River In Hindi

 

नदी, नदी

तुम कहाँ चली

इतनी तेजी से तुम बहती

आखिर इतनी क्यों जल्दी?

 

पर्वत से तुम नीचे आती

घाट-घाट से मिलती जाती

किसी जगह तुम कभी ना रुकती

आखिर किससे मिलने की जल्दी?

 

बादल से तुम दौड़ लगाती

कल-कल की आवाज सुनाती

कितनी मधुर ध्वनि तुम्हारी

जैसे कान्हा की बांसुरी।

 

निर्मल, निर्झर बहती तुम

घाट-घाट से कहती तुम

अभी ना रोको जाने दो

समय नहीं है मत रोको।

 

बहकर जाती कहाँ बताओ

अपने घर का पता बताओ

मुझको मिलना है तुमसे

मीठी बातें करना है तुमसे।

धर्मेंश कुमार सिंह (गोण्डा)

 

 

नदिया

Poem On Nadi In Hindi

 

ओ नदिया की धार,

चली है किसके द्वार,

मीठा-मीठा जल ये तेरा,

खारा है संसार।

 

चले तू बल खाती, 

लेकर जीवन आधार,

मीठे जल को लेकर,

तुम जाना सबके द्वार।

 

तुझको बहते जाना है,

नहीं तू रूक जाना,

घर-घर तू जाना बहना,

सबको समझाना।

 

मीठा तेरा पानी है,

खारा-खारा है संसार,

पानी सबको पिलाना,

प्यास सभी की बुझा जाना।

 

बुराई सबकी लेना जाना,

अच्छाई अपनी दे आना,

सबको नहलाती आना,

मन के मैल सभी के धो जाना।

 

तुमको बहते जाना है,

अपने साजन के द्वार,

बस तुम चलती जाना,

निरंतर और लगातार।

 

रस्ते ऊँचे-नीचे होंगे,

मोइ मिलेंगे एक हजार

मिलने अपने साजन से,

बहते जाना है लगातार।

 

लक्ष्य मुश्किल होता है,

फिर भी हासिल तो होता है,

जब ठान लिया मन में,

तब तो हांसिल होता है।

 

यौवन में जब होती है,

असीम फिर बन जाती है,

फैलाव हो जाता है,

कुछ शिक्षा दे जाता है।

 

सीमाओं के टूटने पर भी,

विस्तार हो जाता है

विस्तार पाने को,

कुछ तो करना पड़ता है।

 

बहना बहती जाना तुम,

नयी पीढ़ी को कुछ समझा जाना,

मुश्किल राहों में आती हैं,

नहीं उनसे तुम घबराना।

 

कुछ करना है जीवन में,

तो लक्ष एक ही बनाना,

दूर होकर सभी नशों से,

बस लक्ष को भेदते जाना।

 

तुम बहते-बहते जाना,

साजन से जाकर मिलना,

साजन के आगोश में जाकर,

सागर जैसी बन जाना।

 

फिर धीरे-धीरे एक दिन,

तुम ऊपर को उड़ आना,

ऊपर जाकर फिर तुम,

नदियां में गिर जाना।

हरिओम शर्मा

 

 

नदी से मुलाकात

Nadi Par Kavita

 

आज हुई मेरी एक

नदी से मुलाकात,

ऊँचे नीचे रास्तों पर

बढ़ रही थी लगातार।

 

जब आए मार्ग में अवरोध,

खुद को थोड़ा ले रही थी मोड़।

 

रास्ते में बाधक बनी एक चट्टान ,

तीव्र धारा ने तोड़ा उसका अभिमान।

 

मार्ग हो गया फिर थोड़ी संकरा,

मुझे लगा यहाँ तो अब तुम गई पकड़ा।

 

पर, बदल दिया उसने अपना स्वरूप

ढल गई उसके ही अनुरूप।

 

गुनगुनाते हुए कलकल गीत,

सुना रही थी मधुर संगीत।

 

बूंद-बूंद को संग्रहित कर,

प्रगति पथ की ओर अग्रसर ।

 

कठिन डगर और लम्बा सफर,

विश्वास, संयम संग था मगर ।

 

और अंत में, मिल गई सागर में जाकर,

मुझे जीवन एक संघर्ष बताकर।

स्वाति सौरभ

 

 

हां नदी में

Poem On River

 

हाँ नदी हूं मैं

अनेक है रूप मेरे

अनेक रंग है

हाँ नदी हूं मै

 

कहीं कहलाती मैं गंगा

कहीं हूं यमुना

कहीं गंगोत्री

कहीं मंदाकिनी हूँ मैं

हाँ नदी हूँ मैं

 

कोई सीमा नहीं है मेरी

बंधन मुक्त हूँ मैं

शीतलता से भरपूर हुन

हाँ नदी हाँ मैं

 

अथक हूँ मैं

बहती ही जाती हूँ

शांत हूँ चंचल हूँ

कहीं बाढ़ बन कहर भी लाती हूं

हाँ नदी हूँ मैं

 

जब तक बहती जाऊंगी

बाधाओं सेन घबराऊँगी

चट्टानों से टकरा कर कभी

नया जीवन मैं पाती हूँ

हाँ नदी हूँ मैं

 

कहीं मेरा जन्म हुआ

कहां मैं पहुंच जाती

पीछे मुड़ना काम नहीं

आगे बढ़ना सिखाती हूँ

हाँ नदी हुँ मैं

डॉ. मीनू सुखमन

 

नदी

Poem On River In Hindi

 

बहने दो,

नदियों को,

खुद से अलग होकर।

 

सुना है,

नदी बहकर।

सागर में ही तो,

मिल जाती है।

 

रोको अगर बहाव,

तो ज़लज़ला,

ले आती है।

 

कल कल करती,

सब को पोषण देती,

खुशहाल करती।

 

बढ़ती जाती है,

मिटा देती है।

वजूद को अपने,

विशाल समुद्र में,

समाहित हो जाती है।

 

नदी-सा बनना,

असीम हृदय,

भावपूर्ण जीवन,

आसान नहीं है।

 

हाँ पर नामुमकिन भी नहीं है,

विशाल व्यक्तित्व रखना।

नदी की तरह जो,

जीवनदायिनी बन जायें।

नेहा जैन

 

नदी

Poem On Nadi In Hindi

 

बह रहा हूँ

मैं तुम्हारे साथ

जैसे जल नदी का

काँपता है

 

हर लहर के साथ

नक्षत्रों भरा आकाश

जैसे पल नदी का

साथ रहते

आ गया है

 

रेत में फँसना

बन्धनों की

हर चुनौती

थामकर हँसना

क्या करेगा

 

पाँव के नीचे पड़ा

दलदल नदी का

कौन हूँ मैं

कौन हो तुम

प्रश्न है बेकार

 

बन गए हैं

आज हम जब

धार केवल धार

तटों से

मुठभेड़ करते और

छूते तल नदी का

माहेश्वर तिवारी

 

 

मुझे नदी बनना है

Nadi Par Kavita In Hindi

 

मुझे नदी बनना है

हर घड़ी गतिशील रहे,

हृदय के अतंश गूफा में,

छुपा ख़लिश

नदी की तरह तरल हो

 

मुझमें प्रवाहित होता रहे

नदी सी चंचल

शोख बन बहती रहूँ

सदा मदमस्त

अपनी धाराओं में

सीमाओं को लांघती

 

मर्यादाओं को तोड़ती

स्वच्छंद हो

अविरल बहती जाती

प्रतिपल प्रतिक्षण

आगे बढ़ती जाती

कई नये तट बनाती

 

कुछ पुराने को बिसराती

उश्रृखंलताओं की सीमा को

रख कहीं ताख़ पर

सारी वर्जनाओं को पार कर

समतल हो या वक्र सी

बस अविरल बहती

 

मेघों के बूंदों को

अपने अंकों में ले

स्वच्छ सुंदर

नया प्रवाह बनाती

कल-कल कर बहती

छम-छम हंसती जाती

 

हर राह लगे

मुझको प्यारा

चाहे आकाश तले

या शमशान किनारा

भूलती नहीं बहना

बाधाओं को पार करती

 

आपदाओं को चीरती

अपने गतब्य को

बढ़ती जाती

अपनी संपूर्ण कामनाएं ले

अंततः सागर मे जा मिल जाती।

डॉ विभा रजंन (कनक)

 

नदी सी प्यास

Nadi Par Kavita

 

हम नदी के दो किनारे

साथ चल कर मिल न पाएँ

घेर लेती हैं हजारों

अनछुई संवेदनाएँ।

 

ज्वार सा हिय में उठा, जब

शब्द उथले हो गए थे

रेत पर उभरे हुए शब्द

संग लहर के खो गए थे।

 

मैं किनारे पर खडी थी

छेड़ती नटखट हवाएँ

हम नदी के दो किनारे

साथ चलकर मिल न पाएँ।

 

स्वप्न भी सोने न देते

प्रश्न भी हैं कुछ अनुत्तर

आँख में तिरता रहा जल

पर नदी सी प्यास भीतर।

 

रास्ते कंटक बहुत हैं

बाँचते पत्थर कथाएँ

हम नदी के दो किनारे

साथ चल कर मिल ना पाएँ।

 

हिमशिखर, सागर, नदी सी

नेह की संयोजना है

देह गंधों से परे, मन,

आत्मा को खोजना है।

 

बंद पलकों से झरी, उस

हर गजल को गुनगुनाएँ

हम नदी के दो किनारे

साथ चल कर मिल न पाएँ।

शशि पुरवार

 

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