Top 33+ Best Maa Saraswati Vandana In Hindi | सरस्वती वंदना और अर्थ

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Maa Saraswati Vandana In Hindi :- माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात् बसन्त पंचमी माँ सरस्वती की पूजा- आराधना का विशिष्ट दिन है। सरस्वती शब्द का शाब्दिक अर्थ है- ‘सरस की स्वामिनी’ अर्थात् रसपूर्ण दिव्य भावों को प्रदान करने वाली देवी माँ। माँ सरस्वती को विद्या, ज्ञान, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण सर्वाधिक सरस्वती नाम से जाना जाता है।

चन्द्रमा की भाँति गौरवर्ण माँ सरस्वती अपने दोनों हाथों में वीणा धारण करती हैं। माँ सरस्वती के तीसरे हाथ में पुस्तक तथा चौथे हाथ में स्फटिक की माला सुशोभित रहती है।

जहाँ वीणा संगीत और कला तथा पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है, वहीं स्फटिक की माला इस बात का प्रतीक है कि माँ सरस्वती को भगवान् शिव के समान ही तप करना प्रिय है। माँ सरस्वती का वाहन हंस भी सात्त्विक गुणों को दर्शाता है।

माँ सरस्वती का आसन भी श्वेत कमल पुष्प है। विद्या, कला, ज्ञान-विज्ञान और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती को सफेद रंग की वस्तुएँ प्रिय हैं।

माँ सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करने के साथ ही आभूषण भी मोतियों के बने हुए ही धारण करती हैं। यही कारण है कि माँ सरस्वती की पूजा-आराधना करते समय श्वेत रंग की वस्तुओं यथा-दूध-दही-मक्खन, सफेद तिल का लड्डू, श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, श्वेत परिधान, श्वेत अलंकार (चाँदी से निर्मित), खोवे का श्वेत मिष्ठान्न, शर्करा, श्वेत मोदक, घृत, नारियल, नारियल का जल, श्रीफल आदि का ही उपयोग करने का शास्त्रीय विधान है।

गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में माँ सरस्वतीजी और देवनदी गंगाजी के संबंध में वर्णित है कि-

 

Saraswati Vandana In Hindi

 

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता।

जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।

मज्जन पान पाप हर एका।

कहत सुनत एक हर अबिबेका।।

 

अर्थात् मैं सरस्वतीजी और देवनदी गंगाजी की वन्दना करता हूँ। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्र वाली हैं। एक (गंगाजी) स्नान करने और जल पीने से पापों को हरती हैं और दूसरी (सरस्वतीजी) गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं। भाव यह है कि देवनदी गंगा और माँ सरस्वतीजी दोनों एक समान ही पवित्रकारिणी हैं। एक पापहारिणी और एक अविवेकहारिणी हैं।

भारतवर्ष में बसन्त पंचमी के अवसर पर माँ सरस्वती की पूजा-आराधना का उत्सव बड़े व्यापक रूप से मनाए जाने का यही रहस्य है। विद्यालयों में माँ सरस्वती की जयन्ती एक उत्सव के रूप में हर्ष और उल्लास के साथ मनाई जाती है। विद्यालयों में विद्यार्थियों द्वारा विद्या, कला, ज्ञान-विज्ञान और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की स्तुति एवं ध्यान करने के लिए निम्नलिखित दो श्लोकों से वन्दना की जाती है-

 

या कुन्देन्दुतुषारहालधवला

या शुभ्रवस्त्रावृता,

या वीणावरदण्डमण्डितकरा

या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिःर

देवै सदा वन्दिता,

स मा पातु सरस्वती भगवती

निःशेषजाड्यापहा।।

 

अर्थात् जो कुन्दपुष्प, चन्द्रमा व हिमकिरणों के हार की भाँति श्वेत हैं, जो सफेद वस्त्र धारण किए हुए हैं, वीणा से जिसके हाथ शोभायमान हैं, जो श्वेत कमल के आसन पर विराजमान हैं, जो ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि जड़ता को देवताओं द्वारा सदैव पूजनीया हैं, वह समस्त दूर करने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें।

 

शुक्ला ब्रह्माविचारसारपरमां

आद्यां जगद्व्यापिनीम्,

वीणा पुस्तकधारिणीमभयदां

जाड्यान्धकारापहाम्।

 

हस्ते स्फटिकमालिकां विद्धती,

पद्मासने संस्थिताम्

वन्दे तां परमेश्वरी भगवती

बुद्धिप्रदां शारदाम्।।

 

अर्थात् श्वेत वर्ण वाली, ज्ञानमय विचारों से परिपूर्ण, आदिकाल से ही पूजनीया, सम्पूर्ण संसार में व्याप्त, वीणा और पुस्तक को धारण करने वाली, अभय प्रदान करने वाली, जड़तारूपी अंधकार को दर करने वाली, हाथों में स्फटिक की माला धारण करने वाली, कमल के आसन पर विराजमान, ऐश्वर्यमयी, बुद्धिप्रदाता देवी शारदा की मैं वंदना करता है।

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

हे विद्यादायिनी, हे हंसवाहिनी,

करो अपनी कृपा अपरंपार।

हे ज्ञानदायिनी, हे वीणावादिनी,

बुद्धि दो, करो भवसागर से पार।।

 

हे कमलवासिनी, हे ब्रह्मापुत्री,

तम हर, ज्योति भर दो,

हे वसुधा, हे विद्यारूपा,

वीणा बजा, ज्ञान प्रबल कर दो।।

 

हे वाग्देवी, हे शारदे,

हम सब है, तेरे साधक।

हे भारती, हे भुवनेश्वरी,

दूर करो हमारे सब बाधक।।

 

हे कुमुदी, हे चंद्रकाति,

हमने ज्ञान तुमसे है पाया।

हे जगती, हे बुद्धिदात्री,

हमारा जीवन तुममें समाया।।

 

हे सरस्वती, हे वरदायिनी,

तुम्हारे हाथों में वीणा खूब बाजे।

हे श्वेतानन, हे पद्यलोचना,

तुम्हारी भक्ति से मेरा जीवन साजे।।

 

हे ब्रह्म जाया, हे सुवासिनी,

कर में तुम्हारे ग्रंथ विराजत।

हे विद्या देवी, हे ज्ञान रूपी,

ज्ञान दे करो हमारी हिफाजत।।

-अंकुर सिंह

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

पद्मासिनी वरदान दो,

जड़ता मिटा कर ज्ञान दो।

नव प्रेरणा नव प्राण दो,

पद्मासिनी वरदान दो।

 

हे ज्योतिका, स्वरसाधिका,

तुम ही हरो तम उर्मिका।

रौशन जगत वसुधान दो,

जड़ता मिटा कर ज्ञान दो।

 

हे मान देवी, हंसिका,

किशलय नवल दो पल्लिका।

जड़ चेतना प्रतान दो,

जड़ता मिटा कर ज्ञान दो।

 

ये स्नेहयम संसार हो,

उत्तम मनुज व्यवहार हो।

पूजन दिशा ईशान दो,

जड़ता मिटा कर ज्ञान दो।

 

माँ ईषिका, तुम तारिका,

तुम गीतिका, तुम कंजिका।

हर होंठ पर मुस्कान दो,

जड़ता मिटा कर ज्ञान दो।

-स्नेहलता

 

मां शारदे वन्दना

Saraswati Vandana

 

हे मां शारदे! नमन आपको,

शत् शत् बार प्रणाम आपको।।

तू ही जग की पालनहार,

करती सबकी नैया पार।

सुख और शान्ति से भर दे द्वार,

करूं भक्ति और रिझाऊं आपको,

शत् शत् बार प्रणाम आपको।।

 

सबको देती शुद्ध विचार,

भक्ति भाव से मन भर जाता।

जब करते हैं तेरा ध्यान,

ज्ञान की देवी माता तुम हो।।

शुरू करें हर काम हम प्रतिदिन,

करके मन से ध्यान आपको,

शत् शत् बार प्रणाम आपको।।

 

तू ही तो इस जग की माता,

बिन तेरे किस ओर मैं जाता।

भर दे झोली माता मेरी,

हरदम तेरा ध्यान लगाता।

मन से तेरी करूं वन्दना,

दूर करो मां हर विपदा को,

शत् शत् बार प्रणाम आपको।।

 

मां मैं प्रार्थना करता हूं,

तुम सबको देना सदबुद्धि।

पापों से तुम हमे बचाना,

भूल भटक जाएं यदि हम सब,

तो सही राह फिर हमें दिखाना।

ऐसा वर देना हम सबको,

करूं ध्यान हर रोज आपको,

शत् शत् बार प्रणाम आपको।।

-अभिषेक विश्वकर्मा

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

जय हो, जय हो, जय हो।

वागीश्वरी मां तेरी कृपा से,

जन मन निर्भय हो।

जय हो, जय हो, जय हो॥

 

शुभ ज्योत्सना तू ब्रह्माणी,

वीणा पुस्तक कर में धारणी।

तेरी कृपा बिन्दु से मैया,

दिव्य ज्ञान का पुंज उदय हो॥

 

जन मन निर्भय हो,

जय हो, जय हो, जय हो॥

योगी वेद सुरेश मनावें,

शेष महेश तेरे गुण गावें।

 

हम स्तुति पूजन न जाने,

विनय है मम मन ज्योतिर्मय हो॥

जन मन निर्भय हो,

जय हो, जय हो, जय हो॥

 

बुद्धि विवेक हृदय में भरना,

रसना पर माँ आसन करना॥

बोलें मधुर सत्य हितकारी,

‘अंकुर’ वाणी अमृतमय हो॥

जन मन निर्भय हो,

जय हो, जय हो, जय हो॥

-निरंजन कुमार तिलक

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

ज्ञान सभी भक्तों को देती।

अन्धकार मन का हर लेती।

तुम विवेक, विद्या की देवी,

तेरा कोटि-कोटि अभिनन्दन।

सरस्वती माँ! शत-शत वन्दन।।

 

वीणा का संगीत सुनाती।

गीत मनोहर मोहक गाती।।

फूटा करता सदा सरस स्वर

मन्ज-मुग्ध होता है जन-जन।

सरस्वती माँ! शत-शत वन्दन।।

 

देख समुज्ज्यल रूप तुम्हारा।

विस्मित होता है जग सारा।।

पुस्तक-माला से हो शोभित,

सुन्दर श्वेत हंस है वाहन।

सरस्वती माँ! शत-शत वन्दन।।

 

जिसे तुम्हारा वर मिल जाता।

उसका हृदय-कमल खिल जाता।।

पा तेरा आशीष सुमंगल,

ज्योतिर्मय हो जाता जीवन।

सरस्वती माँ! शत-शत वन्दन।।

 

हम पर निज करुणा बरसाओ।

हमको सही राह दिखलाओ।।

कृपा करो हम सबके ऊपर,

करते हम नित पूजन-अर्चन।

सरस्वती माँ! शत-शत वन्दन।।

-विनोदचंद्र पाण्डेय

 

वाणी बन्दना

Saraswati Vandana In Hindi

 

माँ शारदे करूँ मैं तेरी वन्दना,

मन को मेरे निष्कलुष तू बना।

विद्या और बुद्धि का वर दे मुझे,

हर अज्ञान-तम श्वेतपद्मासना।

 

तेरी कृपा से वाल्मीकि-व्यास,

अमरकीर्ति हो गये कालिदास।

सुशिक्षित बनें, सुसंस्कृत बने,

है माँ मेरी बस यही कामना।

 

माँ शारदे करें मैं तेरी बन्दना,

मन को मेरे निष्कलुष तू बना।

विद्या और बुद्धि का वर दे मुझे,

हर अज्ञान-तम श्वेतपद्मासना।

 

हंस-सा नीर-क्षीर-बिबेकी बनूँ,

मैं भी तुझको वहन कर सकूँ।

वरेण्य कवि या कलाकार हों,

सब करते हैं माँ तेरी साधना।

 

माँ शारदे करूँ मैं तेरी वन्दना,

मन को मेरे निष्कलुष तू बना।

विद्या और बुद्धि का बर दे मुझे,

हर अज्ञान-तम श्वेतपद्मासना।

 

सात्विक बन जाये यह जीवन,

प्रतिपल तेरा ही रहे स्मरण।

माहात्म्य अकथ तेरी माँ भारती,

काव्य-संगीतमय तेरी प्रार्थना।

 

माँ शारदे करूँ मैं तेरी वन्दना,

मन को मेरे निष्कलुष तू बना।

विद्या और बुद्धि का वर दे मुझे,

हर अज्ञान-तम श्वेतपद्मासना।

-मित कुमार

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

कुंदामाल मैं अर्पित करती,

श्रध्दा पुहूप समर्पित करती।

हे त्रिगुणा त्रिलोकव्यापिनी,

सुर की देवी संगीतदायिनी।

 

मै लोहा धातु तुम पारस,

स्वर्ण बनाओ चढ़ाऊं गंधरस।

शब्द शक्ति उत्कृष्ट बना दो,

अमृत ज्ञान का मुझे पिला दो।

 

अनुशीलन वेदों का करूं,

ध्यान गुरूचरण कमल धरूं।

कलम को मेरी बुध्दि देना,

हृदय भाव में शुध्दि देना।

 

स्नेहमयी आचरण होवे,

भाई-भाई में रण न होवे।

ब्रम्हचारिणी हे आराध्या,

जन-जन को दान दो विद्या।

 

कलम सैन्य गढ़े नव साहित्य,

प्रखर तेज हो बने आदित्य।

“स्नेह” दासी अरदास करें,

धरती गगन उल्लास भरे।

-स्नेहलता

हे वीणा वाली

Saraswati Vandana

 

वीणा वाली शारद मैया,

हमको दे दो ज्ञान।

नन्हे नन्हे बच्चे हैं हम,

करें आपका ध्यान।।

 

चरणों में हम शीश झुकाते,

करते हैं सम्मान।

हाथ जोड़ कर विनती करते,

करेंगे न अपमान।।

 

दीप ज्ञान की जल जाये माँ,

करते सभी प्रणाम।

हम भी आगे बढ़ते जायें,

जग में हो सब नाम।।

 

आशीर्वाद हमें दो माता,

करें नेक हम काम।

पढ़ लिख कर विद्वान बनें हम,

रौशन कर दो नाम।।

-प्रिया देवांगन

सरस्वती वन्दना

Saraswati Vandana

 

क्यों विलम्ब अविलम्ब पधारो,

है आलम्ब तुम्हारा माँ।

सदा विराजो उस मन मन्दिर,

जिसने तुम्हें पुकारा माँ।।

 

संस्कार सत आदर्शों से,

रहा पुराना नाता है।

भरे पड़े दृष्टान्त अनेकों,

सकल विश्व यश गाता है।।

 

आन, बान, सम्मान बढ़ाया,

भारत माँ के लालों ने।

भला भीरुता कब दिखलाई,

राणा जी के भालों ने।।

 

बन्धु आज भगिनी निज छेड़े,

घर से तुम्हें गुहारा माँ।

क्यों विलम्ब अविलम्ब पधारो,

है आलम्ब तुम्हारा माँ।।

 

ह्रास हुआ नैतिक मूल्यों का,

नर मानवता खो बैठा।

उर दुर्गुण का भरे पिटारा,

रिश्ते सारे धो बैठा।।

 

उजड़ सूखती प्रेम बल्लरी,

बहे न निर्मल धारा है।

पग-पग झूठ सत्य पर भारी,

कैसे मिले किनारा है।।

 

भाव सरस अन्तर बरसाओ,

होगा तभी गुजारा माँ।

क्यों विलम्ब अविलम्ब पधारो,

है आलम्ब तुम्हारा माँ।।

 

वर दे कुछ ऐसा ही मुझको,

सबका दर्द मिटाऊँ मैं।

शब्द बाण बनकर तम हरदें,

ऐसा कुछ लिख जाऊँ मैं।।

 

नये पंख नभ नया मुझे दे,

नियत लक्ष्य पा जाने को।

शोषित मदद हेतु नव गति दे,

कर गह साथ उड़ाने को।।

 

जब भी ‘माधव’ पड़े जरूरत,

तेरा ही दर न्यारा माँ।

क्यों विलम्ब अविलम्ब पधारो,

है आलम्ब तुम्हारा माँ।।

-सन्तोष कुमार 

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

ब्रम्हा जी के जल सिंचन से,

प्रगटी माँ वागेश्वरी।

चतुर्भुजी रूप अनोखा,

सोमयरूपा करुणेश्वरी।।

 

वीणापाणी ले वेद हस्त,

शुभ स्फटिक माल।

हरने को जन जन,

का मोह जाल।।

 

कर हंस की सवारी,

माँ श्वेत वस्त्र धारिणी।

पुष्प माल से शोभित,

छवि मंगलकरिणी।।

 

माँ ने जब छेड़ी,

वीणा की मधुर ताना

जलचर थलचर सारे,

जीवों में आ गई जान।।

 

चली पवन सरसर सरसर,

जल कलकल छलछल।

चंचरीक के मधुर कलरव से,

चारो ओर मच गई हलचल।।

 

सुर मुनि शेष नारद शारद,

माँ की करे स्तुति गान।

मातु भारती हंस वाहिनी,

ब्रम्हाणी स्वीकारो सम्मान।।

 

अष्ट सिद्धि नव निधि,

सकल कलाओं की दाता।

हर लो माँ अज्ञान हमारा,

मेरी भाग्य विधाता।।

-पद्यमनी साहू

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana In Hindi

 

मन से मिटे कुविचार माँ शुभ कर्म का उपहार दे।

पग में झुकाकर शीश मैं अब मांगता वर शारदे।।

हिय से लगा कर वत्स का दुविधा सदा तुम पाटती।

हर विघ्न में बन ढाल माँ विपदा सभी भय छाँटती।।

 

कर नेह की बरसात माँ निज पुत्र को तब पालती।

हर बात का रख ध्यान माँ गुण पुत्र के उर डालती।।

ममता दिखाकर नेह से विपदा मिटा सुख सार दे।

पग में झुकाकर शीश मैं अब मांगता वर शारदे।।

 

ममतामयी सुखदायिनी वरदायिनी दुखनासिनी।

ममता तले रख ज्ञान दो दुख दूर हो मुखवासिनी।

मतिमंद को अब ज्ञान का वरदान दो भवतारिणी।

अनभिज्ञता हिय से मिटे यह मान दो जगकारिणी।।

 

मतिमूढ़ को अब बोध का वरदान दे तम तार दे।

पग में झुकाकर शीश मैं अब मांगता वर शारदे।।

शुचि ज्ञान का सुविचार दो तम नाश हो तमहारिणी।

करता रहूँ नित ध्यान पूजन मातु हे! उपकारिणी।।

 

मतिमूढ़ मैं मतिमंद बालक ज्ञान दो वरदायिनी।

उर में रहे निज भक्ति का वरदान दो अनपायनी।।

वरदान दे भव ज्ञान दे अनभिज्ञ को कछु प्यार दे।

पग में झुकाकर शीश मैं अब मांगता वर शारदे।।

-पं संजीव शुक्ल

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

माँ शारदे कहाँ तू,

वीणा बजा रही है।

किस मंजू ज्ञान से तू,

जग को लुभा रही है।

 

कुंठित हृदय से आज है,

मानवता भरी हुई।

इंसानियत धरा पे,

क्यों डगमगा रही है।

 

पेशे सभी पैसों के लिए,

आज बिक रहे।

मंदिर से ज़्यादा आज है,

मयकदे सजे हुए।

 

उज्ज्वल था जो भविष्य वो,

उफान ले रहा।

क्यों जाति, धर्म के नाम पर,

बँट रहा है इंसान।।

 

शब्दों का राग भर दे,

माँ मन में मिठास भर दे।

हर नारी में हों मीरा,

नर तुलसीदास कर दे।

 

सम्मान हो सभी का,

नहीं कहती सिर्फ स्त्री का।

कोई विशेष ना हों,

कोई भी शेष ना हों।

 

सबका कल्याण कर दे।

अज्ञानता, मनुजता को खोती ही जा रही है।

माँ शारदे कहाँ तू,

वीणा बजा रही है?

-पलक सचान

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana

 

वीणावादिनी वर दे, वर दे,

वीणावादिनी वर दे।

उर से तम को हटाओ माता,

वीणावादिनी वर दे।

 

तेरे बालक भटक रहे हैं,

जीवन के अंधियारे में।

फिर से उनको राह दिखा दे,

लौटा ले उजियारे में।

 

शुभ्र अंतस हो सबका माता,

निश्छल मन कर दे,

वीणावादिनी वर दे।

अज्ञानी हैं बालक तेरे,

ज्ञान का पाठ पढ़ा दे।

 

दयामयी मां जग में फिर से,

निर्मल गंगा बहा दे।

सहज-सरल हो जीवन सबका,

तू ऐसा वर दे, वर दे।

वीणावादिनी वर दे

-अर्पणा कुमारी

 

मां शारदे

Saraswati Vandana

 

मुझे ज्ञान का अपरम संसार दो

वीणावादिनी जय माँ भारती

तुम कमलवासिनी सुरमय हो

मुझे सुर लय ताल का

अभिमान दो

वीणावादिनी…

 

हे ज्ञानदायिनी!, हे हंसवाहिनी!

तुम शांत हो बुद्धिदायिनी हो

मुझे सद्बुद्धि का उपहार दो

वीणावादिनी…

 

हे ब्रह्मचारिणी! हे वरदायिनी!

तेरी शरण का वरदान दो

वीणावादिनी…

मुझे ज्ञान का अपरम संसार दो

वीणावादिनी…

-कीर्ति सिंह

 

माँ भारती वन्दना

Maa Saraswati Vandana Lyrics In Hindi

 

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

शुभ्र मस्तक मुकुट सोहे,

तुंग हिमगिरि धवल शीतल।

मध्य मुक्ता सम सुहासित,

धरा उर्वर शस्य श्यामल।

 

पाँव जिसके है पखारे,

नील जलनिधि मत्त सागर।

रत्न मुक्ता मणि विपुल से,

है भरा जिसका ये आगर।

 

पवन है अविरल उतारे,

मातु तेरी आरती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

राम की पावन ये धरती,

कृष्ण ने गीता सुनायी।

जटाधारी भोले शंकर,

की है काशी पुण्यदायी।

 

बुद्ध की ये कर्मभूमि,

ज्ञान की धरती यही है।

शान्ति की सरिता मधुर,

अरिहंत की शिक्षा बही है।

 

ज्ञान की जननी यही है,

पुण्य स्वर उच्चारती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

युव विवेका की ये जननी,

विश्व को संदेश देकर।

धर्म की गरिमा बताया,

शून्य का आधार लेकर।

 

देवभूमि है हिमाचल,

दिव्य आभा से सुसज्जित।

स्वर्ग सी सुन्दर सजीली,

काश्मीरी मुग्ध प्रमुदित।

 

उत्तराखंडी धरा है,

मंत्र धुन उच्चारती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

पंच नदियों की धरा,

पंजाब है समृद्ध प्यारा।

दूध दधि मट्ठा से पूरित,

दिव्य भोजन का सहारा।

 

राष्ट्रभक्तों की ये धरती,

आन जिनका शान है।

देश की रक्षा की खातिर,

तन है जीवन प्रान है।

 

प्रेम के धुन से है गुंजित,

ये धरा माँ भारती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

भव्य है इतिहास जिसका,

राजपूती शान है।

वीरगाथाएँ समेटे,

भू ये राजस्थान है।

 

है नहीं सानी जहाँ की,

वीरता की बानगी।

जौहरों की पुण्य गाथा,

है कहानी मान की।

 

वीरसूता है धरा ये,

धन्य हे माँ भारती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

राम ने की थी जहाँ,

शिव की महा आराधना।

सेतु बाँधा वानरों ने,

दिव्य था कौशल घना।

 

देश अपना था समुन्नत,

ज्ञान में विज्ञान में।

विश्वगुरु था देश अपना,

हर विधा सम्मान में।

 

फिर से है गौरव वो लाना,

आज हे माँ भारती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

 

योग का सन्देश हमने,

ही दिया है विश्व को।

बाबा गोरख औ पतंजलि,

की विधा इस विश्व को।

 

विश्व ने माना औ जाना,

योग के औचित्य को।

आपदा ने जब हिलाया,

विश्व के अस्तित्व को।

 

वेदआयुष की महत्ता,

आज दुनिया मानती।

जयतु जय माँ भारती,

जय भारती माँ भारती।

-संजय कुमार राव

 

वाणी वंदना

Saraswati Vandana Lyrics

 

जय-जय हे अम्बे वागीश्वरी

नाद ब्रह्ममयी ओंकारेश्वरी॥

शुक्लाम्बर धर जगति तमस हर,

दिग-दिगंत अंतस निर्मल कर।

 

मानस हंस सदृश गुणधारिणि,

जिह्वा शब्दमयी सिद्धेश्वरी।

जय जय हे अम्बे वागीश्वरी

शिशिरकनाधर कमलासन वर,

वीणा पाणी सुर सरिता झर।

 

अनहद नाद हृदय आंदोलित,

शिवानृत्य प्रकटो योगेश्वरी।

जय जय हे अम्बे वागीश्वरी

पुस्तक धारिणि ज्ञान विहारिणि,

असत् निवारिणि सत् संभारिणि।

 

मृत से अमृत बनाने वाली,

मुझ पर कृपा करो परमेश्वरी।

जय जय हे अम्बे वागीश्वरी

-महेंद्रनाथ तिवारी

 

सरस्वती वंदना

Saraswati Vandana Lyrics

 

हे शारदे मां हे शारदे मां हे शारदे मां,

मुझको ज्ञान का सार दे।

मुझको भक्ति का दे दो दान,

जो दीवाना कर दे।

 

मुझको पिला दो सिंगार प्रेमी ज्ञान,

जो मस्ताना कर दे।

मां मेरी मसूरियत को दिल,

रूबा कर दे।

 

मां मेरी मुस्कान पे यू ही,

अलख ज्योति निहारती रहे।

मां आप हृदय की करुणा कामना कांत कर दें,

विरत कब तक चातक से जलद है।

 

स्वाति से मुक्ता भरिता सीप कर दे,

हे शारदे मां हे शारदे मां हे शारदे मां।

मां वीणा की तान से राग तरंग दे,

नवगति नब लय ताल छंद नव।

 

नवल कंठ नब जलद मंदरव,

नव नभ के नव बिहग बंद को।

नव पर नव स्वर दे

हे शारदे मां हे शारदे मां हे शारदे मां।

-इच्छा पोरवाल

 

सरस्वती वंदना गीत

School Saraswati Vandana

 

वर दे, वीणावादिनि वर दे।

प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव,

भारत में भर दे।

 

काट अंध-उर के बंधन-स्तर

बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;

कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर,

जगमग जग कर दे।

 

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;

नव नभ के नव विहग-वृंद को,

नव पर, नव स्वर दे।

वर दे, वीणावादिनि वर दे।

 -सूर्यकांत त्रिपाठी 

 

बसन्त पंचमी के दिन पीले रंग के वस्त्र धारण कर माँ सरस्वती की पूजा-आराधना करते हैं। गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के शान्ति निकेतन और काशी के प्रसिद्ध हिन्दू विश्वविद्यालय में माँ सरस्वती की पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है। इस दिन स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों

में विशेष उत्साह दिखाई देता है। इस अवसर पर माँ सरस्वती को आम्र की मंजरी विशेष रूप से अर्पित की जाती है तथा आम्र की मंजरी को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी माँ सरस्वती का निवास माना जाता है इसलिये बसंत पंचमी के

दिन पुस्तकों व लेखनी (कलम) की भी पूजा की जाती है। माँ सरस्वती के पूजन में श्वेत कमल, श्वेत गुलाब, बेला, मोगरा, जूही, चमेली, श्वेत चम्पा और पीत चम्पा के फूलों के अर्पण का विशिष्ट महत्त्व है।

बसन्त पंचमी के दिन माँ सरस्वती की पूजा करके गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन लोग बसन्त रंग में रंगे वस्त्र धारण करते हैं। मन्दिरों में भी भगवान् को बसन्ती अथवा गुलाबी वस्त्र धारण करवाए जाते हैं। लोग इसी दिन से फाग या होली गाते हैं। बसन्त पंचमी से लेकर फाल्गुन की पूर्णिमा तक होली गाई जाती है।

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