Top 21+ Best Poem On Clouds In Hindi | बादल पर कविता

बादल

Poem On Clouds

आओ बादल छाओ बादल,

अब तो सम्भल जाओ बादल।

प्यासी धरती तुम्हें पुकारे,

मन भर जल बरसाओ बादल।

हम नन्हे-मुन्नों के खातिर,

आज नहीं तो कल आओ बादल।

बादल

Poem On Clouds

काले बादल छा गये,

नभ में चारों ओर।

घूम रहे पक्षी सभी,

बच्चे करते शोर।।

शीतल चलती है हवा,

तन मन भी मुस्काय।

बूंद बूंद बरसे जमीन,

मन हर्षित हो जाय।।

सुंदर दिखते बाग है,

लहराते है फूल।

बारिश बूंदें देख कर,

पत्ते जाते झूल।।

छायी सावन की घटा,

आयी है बरसात।

सोचे मानव देख कर,

कैसे बीते रात।।

सूखे सूखे वृक्ष के,

मन में खुशियाँ छाय।

बारिश की फूहार से,

हरी भरी हो जाय।।

-प्रिया देवांगन “प्रियू”

ओ काले-काले बादल कहाँ चले

Poem On Clouds

नन्ही परी बादल से बोली,

ओ काले काले बादल कहाँ चले।

उमड़ते घुमड़ते यहाँ-वहाँ चले,

कौन देश से तुम आए हो।

साथ अपने बरखा लाए हो,

सूरज की तेज धूप ने झुलसा डाला।

गर्मी के मौसम ने तड़पा डाला,

तुम बहुत दिनों में आते हो।

तुम भी हमें बहुत सताते हो,

बादल बोला! ओ नन्ही परी।

मैं दूर आसमान से आया हूँ,

उमड़ते- घुमड़ते तुम्हारे आँगन में।

बूंदों की बौछार करने आया हूँ,

साथ अपने बारिश भी लाया हूँ।

सूरज के तेज धूप ने हमें बुलाया है,

वाष्प बनाकर हमें बादल बनाया है।

अब तक ग्रीष्मकाल की बारी थी,

अब गरजते वर्षा ऋतु आयी हैं।

जल्दी जाओ ! बोला नन्ही परी ने,

तुमको बारिश लेकर बुलाया है।

-सुरेखा नवरत्न

काले मेघा आओ ना

Badal Par Kavita

काले मेघा आओ ना,

गर्मी दूर भगाओ ना।

गगरी खाली गाँव पियासा,

नदियों से ना कोई आशा।

सूख गए सब ताल – तलैया,

कैसे गांयें छम्मक – छैया।

धरती को सरसाओ ना,

काले मेघा आओ ना।

सुबह-सुबह ही सूरज दादा,

गुस्सा जाते इतना ज्यादा।

कष्टों की ना कोई गिनती,

सुनते नहीं हमारी विनती।

कुछ उनको समझाओ ना,

काले मेघा आओ ना।

हमने तुमको भेजी चिट्ठी,

खतम करो अब अपनी छुट्टी।

जल्दी से जल्दी तुम आना,

आने की तारीख बताना।

मस्ती के दिन लाओ ना,

काले मेघा आओ ना।

-कौशल पाण्डेय

छाए बादल

Badal Poem In Hindi

दौड़-धूप कर आए बादल,

सूरज को ढक छाए बादल।

मोर मुदित हैं दादुर हर्षित,

झींगुर हर्ष कर रहे प्रदर्शित।

वायु बना रथ दौड़ रहा है,

मेघदूत हो रहे आकर्षित।

खूब नदी को भाए बादल,

सूरज को ढक छाए बादल।

मेघ धरती को धुल रहे हैं,

रोम कूप सभी खुल रहे हैं।

भास्कर को दिन थका जगा कर,

नेत्र ना उसके खुल रहे हैं।

साथ दामिनी लाए बादल,

सूरज को ढक छाए बादल।

देखो हुई प्रकृति बावली,

है हरियाली भी उतावली।

बादल सखा को देख सांवला,

लो धरती भी हुई सांवली।

सागर के हैं जाए बादल,

सूरज को ढक छाए बादल।

-डॉ. एम.डी. सिंह

बादल भैया आयेंगे

Poem On Clouds In Hindi

गुस्सा थूको, सूरज दादा।

क्रोध नहीं अच्छा है ज्यादा।।

छप्पर छानी छायेंगे।

छाया में बैठायेंगे।।

तंग पसीना करने आता।

चिपचिप चिपचिप खूब मचाता।।

दिन में चैन न पायेंगे।

रातें टहल बितायेंगे।।

संग हवा के चले गये हैं।

बादल भैया छले गये हैं।।

शादी करके आयेंगे।

दुल्हन प्यारी लायेंगें।।

खूब मचेगी धूम-धड़ाका।

तड़-तड़तड़-तड़तड़क-तड़ाका।।

बाराती बन जायेंगे।

गीत खुशी के गायेंगे।।

जीभ उधर पर फेर रही है।

विद्युत दमक बिखेर रही है।।

बादल भैया आयेंगे।

वर्षा रानी लायेंगें।।

दिलीप कुमार पाठक

बादल

Poem On Clouds In Hindi

घम-घम-घम बादल गरजे,

चम-चम-चम बिजली चमके।

काले-काले बादल ऐसे भागे,

जैसे सागर में नौकाएं दौड़े।।

झम-झम-झम वृष्टि बरसे,

अंग-अंग धरा का भीगे।

इला मन ही मन इठलाए,

जैसे जलपरी जल मे इतराए।।

खेतों में हरियाली छाए,

पीली-पीली सरसों लहराए।

उर्वि का तारूण्य निखरे,

जैसे स्वर्ग से अप्सरा उतरे।।

मिट्टी की सोंधी खुशबू आए,

पुष्प डाली-डाली मुस्काए।

मालती का रूप सवंर जाए,

जैसे नववधू का सौदर्य निखरे।।

खग-मृग धमा चौकड़ी मचाए,

शाख पर पिक मधुर गीत सुनाए।

नीलकंठ इन्द्रधनुषीय पंख फैलाए,

जैसे बादल रंगों की बौछार कराए।।

-प्रियंका त्रिपाठी

बादल भैया

Poem On Clouds In Hindi

बादल भैया आए हैं,

सारे नभ में छाए हैं।

काली घटाओं के संग,

धूम-धड़ाका करते हैं।

प्यासी धरती की झोली,

बड़े प्यार से भरते हैं।

मेंढ़क जी टर्राए हैं,

बादल भैया आए हैं।

रूप बदल के मेघा जी,

सागर के घर जाते हैं।

बैंड बजाने को अपना,

आपस में टकराते हैं।

बोझा अधर उठाए हैं,

बादल भैया आए हैं।

बूंद-बूंद से नदियों का,

वेग निस दिन बढ़ाते हैं।

खेतों की क्यारी-क्यारी,

जल अपना बरसाते हैं।

पौधे नए लुभाए हैं,

बादल भैया आएं हैं।

पाकर अमृत जैसा रस,

पेड़ सभी इठलाते हैं।

मिलकर पंछी सारे नित,

वन में गीत सुनाते हैं।

बच्चे सभी नहाए हैं,

बादल भैया आए हैं।

-गोविन्द भारद्वाज

बादल

Poem On Clouds In Hindi

आया बादल छाया बादल।

फिर जल बरसाया बादल।।

नदी नाले ताल-तलैया।

डबडब करता कुआँ भैया।।

आज सबको हँसाया बादल।

आया बादल छाया बादल।।

-टीकेश्वर सिन्हा “गब्दीवाला”

मेघ

Poem On Clouds In Hindi

तड़क-तड़क गरजत मेघ,

चलता दिक् आसमान।

लहलहाते फसल देख,

हँसता खेत किसान।

घूम-फिर आकर नीरद तू,

क्यों वापस चली जाय।

तेरी जल-बूंदे खातिर,

अचला बैठी आस लगाय॥

तेज पवन पुरवैया लायी,

घेर कर जलध आकाश।

अब तो बरसो मेघ रे,

धरती जीवन हैं उदास।

घटा हटा सब्र का पल,

अब बरसों मूसलाधार।

जलधर तेरी वर्षा से,

होगी पुलकित संसार॥

घन सघन ले कर आया,

पानी की बौछार।

जल-बूंद मोती बनकर,

धरणी गिरत फुहार।।

रिमझिम-रिमझिम घन गिरे,

जलमय होत जमीन।

हरी-भरी धरती सुन्दर,

दुनिया दिखे हसीन॥

-सोनू बैठा

जीवन रस बरसाओ मेघा

Poem On Clouds In Hindi

राग मल्हार सुनाओ मेघा

जीवन रस बरसाओ मेघा।

जीव-जन्तु व्याकुल हैं सारे

हर तरु भी अब तुम्हें निहारे।

कब बरसोगे बादल राजा,

धरती मैया तुम्हे पुकारे।

मत अब यूँ तरसाओ मेघा

जीवन रस बरसाओ मेघा।

काले मेघा जब तुम आते।

मोर-पपीहा गीत सुनाते।

भीगें मस्त फुहारों में जब,

नन्हे बालक खुश हो जाते।

धरती को सरसाओ मेघा।

जीवन रस बरसाओ मेघा।

उमड़-घुमड़ कर करो गर्जना।

धरती पर नव करो सर्जना।

कोष लुटा कर तुम पानी का,

प्रकृति की अब करो अर्चना।

हरियाली उपजाओ मेघा।

जीवन रस बरसाओ मेघा।

-उदय मेघवाल ‘उदय’

मेघराज का स्वागत

Poem On Clouds In Hindi

करते कर जोर सुस्वागतम,

हे मेघराज तुम्हारा,

कोटि-कोटिवंदन है,अभिनंदन है,

हे ऋतुराज तुम्हारा ।

उमड़ -घुमड़ कर

जब तुम सब आते हो,

कारे कारे मेघों के संग

जब दुंदभी बजाते हो।

हर्षित ‘प्यासी धरा’ तब हो जाती है,

वर्ष भर की अतृप्त भूमि,

पुलकित हो जाती है।

बूंद बूंद को अमिय समझ कर

अपनी प्यास बुझाती है।

फिर बदले में हीरे-मोती सी

हरित-फलित सम्पदा उगलती है।

पेड़-पौधे, पशु और पक्षी

सभी मिलकर कलरव करते है,

पतझड़ और घोर तपन सहने के बाद

वर्षा ऋतु का स्वागत करते है।

कृषक भी पथराई सूनी सी अँखियों से

नित बादलों को निहारते है,

नीर-भरे, कारे-भूरे मटमैले मेघों को

नैनो से आमंत्रित करते है।

वर्षा आयी खुशियां लायी,

धरा भी खूब लहक उठी।

पेड़ो पर फल फूल, लताएं है लदी हुई,

चिड़िया देखो चहक उठी।

मेघा आये मेघा आये,

गलियां सब गूंज उठी,

छोटी-छोटी नौकाएँ तैरी,

आंगन फुलबारी सब महक उठी।

बच्चों की प्यारी झीनी मुस्कुराहटों से,

गगन भी गूंज उठे।

पानी से हुए लबालब

सब ताल तलैया, बोल उठे।

स्वागत है, स्वागत है,

मेघों आज तुम्हारा स्वागत ।

स्वागत करती है,नदियां भी,

पर्वत भी करते स्वागत है।

-कल्पना द्विवेदी

काले बादल

Badal Poem In Hindi 

उड़ते-उड़ते काले बादल,

लगता जैसे माँ का आँचल।

जब बिजली चमके चमचम,

जड़े सितारें जिसे समझे हम।

रिमझिम-रिमझिम पानी बरसे,

मगन मयूरों के मन हरसे।

पेड़ झूमके खुशी मनाए,

जीव जंतु के मन हर्षाये।

मेघ बजाए ढम-ढम ढोल,

मेंढ़क गाये सुंदर बोल।

अंगना में छनके पायल,

उड़ते-उड़ते काले बादल,

उड़ते-उड़ते काले बादल।

-जीवन चन्द्राकर

बादल

Poem On Clouds In Hindi

जगह-जगह से आते उड़कर,

जमघट लगाते गगन में बादल।

सफेद लाल नारंगी सुनहरा,

रंगों से आकार बनाते बादल।।

हाथी खरगोश उड़ती चिड़िया,

देवरूप परियों बनाते बादल।

असंख्य रूप धारण हैं करते,

उड़ते उमड़ते घुमड़ते बादल।।

गरजते – चमकते बड़े वेग से,

डरावना रूप बनाकर बादल।

बूंद – बूंद कर तो कभी वेग से,

मुसलधार बरसते हैं बादल।।

दिन मे सूरज रात चाँद-सितारे,

छा कर के ढक लेते बादल।

चाँदनी रात मे छितराये रहते,

चन्दा को खूब दौड़ाते बादल।।

चित्रकारी के कुशल चितेरे,

बन जाते आसमान में बादल।

बड़ी फूर्ती से चित्र बनाकर,

रंग मनोहर फिर भरते बादल।।

पानी को कहाँ छुपाकर रखते,

किसी को नहीं बतलाते बादल।

पर्वत पौधे खेत खलिहान,

बरस कर खूब नहलाते बादल।।

ताल-तलैया कुयें गाढ़-गधेरे,

लबालब भर देते हैं बादल।

छा जाती खेतों में हरियाली,

किसान की खुशी लौटाते बादल।।

धरती मे हरियाली छा जाती,

जब मुसलधार बरसते बादल।

जगह- जगह फूल खिल जाते,

मोरों को खूब नचाते बादल।।

जब पड़ती सूरज की किरणे,

इन्द्र धनुष तब दिखलाते बादल।

आसमान धरा सूर्य संग मिल,

सतरंगी परिधान पहनते बादल।।

स्वभाव एक समान रहता,

बदलते रहते पल-पल बादल।

बरसते कभी रिमझिम-रिमझिम,

तूफान-सुनामी भी लाते बादल।।

-डॉ. सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी

बरसते बादल

Poem On Clouds In Hindi

उमड़ घुमड़ बरसे बदरा,

संग संग बहती पुरवाई।

धरती के सारे ताप हर लिए,

जो थी गुमसुम अकुलाई।

तरु के सारे पत्र निखर गए,

धवल धवल रजत कण से।

वो थी कब से राह निहारे,

जाने इस मधुर क्षण के।

बदलियो का स्याह रंग,

जो अंबर से झांकता।

मयूर मन भी मुदित होकर,

पीहू पीहू धुन पर नाचता।

बरस बरस के जल बूंदे,

आज धरा को हरसाये।

धरणी भी पुलकित होकर,

सोंधी सोंधी गंध बिखराये।

तड़ित दामिनी रह रह के,

खूब है चौधियाती।

बादलों के गर्जन संग,

सुर में सुर मिलाती।

दादुरओ के शोर आज,

धरा के उत्सब गान लगे।

विरहिणी का व्यथित मन,

प्रेम रस से भीगा प्रेमपगे।

धरा ने हरित दरी,

बुग्यालो में है बिछाई।

वर्षा के संग झूमते,

चौर गांव अमराई।

-रेखा शाह आरबी

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