Top 39+ Famous Bal Kavita In Hindi | लोकप्रिय बाल कविता हिंदी में

आज की पोस्ट में यहां पर कुछ बेहतरीन शिक्षाप्रद पर आधारित बाल कविता Best 39+ Bal Kavita In Hindi में साझा करने जा रहा हूं।

चूहे की बारात

Bal Kavita In Hindi

चूहे की बारात चली है,
धूम धाम के साथ चली हैं।
मेंढक गिरगिट बने बराती,
चले नाचते सुघड़ मुहाती।
चुहिया के घर आई बारात,
आते-आते हो गयी रात।
खूब छके सबने पकवान,
भाँति भाँति के मेवा मिष्टान।
चूहा बोला दुल्हन लाओ,
उसको मण्डप में बैठाओ।
नही चाहिए हमें दहेज,
दहेज से हमको है परहेज।
हम चूहो ने कसम है खायी,
दहेज न लेगा कोई भाई।
दहेज बहुत बड़ा अभिशाप,
इससे बड़ा नही कोई पाप।
चुहिया रानी खूब लजाती,
बैठी मण्डप में शरमाती।
चुहिया संग ले फेरे सात,
वापस घर आई बारात।
तारा दत्त जोशी

मेंढकी रानी

Bal Kavita In Hindi

दुल्हन बनी मेंढकी रानी,
दूल्हा मेंढक राजा।
गड़गड़-गड़गड़ बादल जी ने,
खूब बजाया बाजा।
तड़तड़- तड़तड़ बिजली चमकी,
भागा दूल्हा राजा।
कूदा , उछला कुएं मे जाकर,
बोला दुल्हन आजा।
बोली दुल्हन मटक-मटककर,
डरो न दूल्हे राजा।
चलो घूमने कुएं से बाहर,
सैर करेंगे आजा।
दुनिया बड़ी बहुत सुंदर है,
ओ-मेरे दूल्हे राजा।
देखेंगे कम्प्यूटर पिक्चर,
हवा खायेंगे ताजा।
दुनिया बदली हम बदलेंगे,
पियेंगे लस्सी माजा।
नहीं बनेंगे कुएं मेंढक
तू ही बाहर आजा।
निकला कुँए से बाहर मेंढक ,
नाचे रानी राजा।
डॉ. सुधा गुप्ता

भालू की फुलवारी

Bal Kavita In Hindi

भालू जी ने रंग-बिरंगे,
सुन्दर फूल लगाये।
फूल खिले तो तितली भौरे,
फूलों पर मँडराये।।
उन फूलों को देख-देखकर,
भालू जी खुश होते।
एक दिवस आ गए वहाँ पर,
हरे-हरे कुछ तोते।।
उन तोतों ने कुतर-कुतर कर,
सारे फूल गिराए।
एक फूल भी बचा नहीं तो,
भालू जी गुस्साए।।
उनका गुस्सा देख-देखकर,
तोते उन्हें चिढ़ाते।
‘गुस्सा करना उचित नहीं है।
भालू को समझाते।।
डॉ. निलोकी सिंह

बाल मुक्तक

Bal Kavita

सदा किताबें देती ज्ञान।
पढ़-पढ़कर बनते विद्वान।
जो चाहो वह जानो समझो,
भाषा, गणित, धर्म, विज्ञान।
आओ हम सब वृक्ष लगायें।
सुखद मनोहर धरा बनायें।
वृक्ष रोकते वायु प्रदूषण,
जीवन में खुशहाली लायें।
साहस दृढ़ता होती जिनके।
मंजिल पास सदा है उनके।
सीखा नहीं हार मानना,
जीत पास आती है चलके।
होते सदा वृक्ष अनमोल।
कौन चुकाता उनका मोल।
वृक्ष लगाना और बचाना,
देना सबसे ऐसा बोल।
सूरज आता सदा जगाने।
आती चिड़ियां गीत सुनाने।
लगता हमको कितना अच्छा,
मम्मी आती हमें उठाने।
कैलाश त्रिपाठी

बंदर को जुकाम

Bal Kavita 

हद से ज्यादा खाये आम।
तब बंदर को हुआ जुकाम ।।
ठंडा गरम साथ में खाता।
ऊपर से पानी पी जाता।।
खूब नहाता सुबहोशाम।
तब बंदर को हुआ जुकाम ।।
छींक छींककर सर चकराया।
टूटा बदन ताप भी आया ।।
नाक हो गई उसकी जाम।
तब बंदर को हुआ जुकाम ।।
बंदर ने भालू बुलवाया।
भालू ने काढ़ा पिलवाया।।
मला माथ पर झंडू बाम।
तब छू मंतर हुआ जुकाम ।।
डॉ. कैलाश सुमन

गौरैया का घर

Bal Kavita In Hindi

मेरे छत के ऊपर उस दिन,
गुमसुम बैठी थी गौरैया।
कभी उछलती-कभी फुदकती,
रोज चहकती थी गौरैया।
पूछा मैंने चिड़िया रानी,
गुमसुम ऐसे क्यों बैठी हो।
करती थी तुम चूं-धूं हरदम,
आज नहीं कुछ तुम बोली हो।
मैंने देखा उस कोने में,
चिड़िया का घर गिरा पड़ा था।
तेज हवा के कारण शायद,
कोने में वह उड़ा पड़ा था।
लेकर सारे तिनके मैंने,
उसके घर को पुनः बनाया।
धीरे से हाथों में लेकर,
चिड़िया को उसमें बैठाया।
रेखा भारती मिश्रा

सूरज दादा गुस्सा है

Short Bal Kavita In Hindi

सूरज दादा गुस्सा है,
धरती माता रूठी है।
मछली जल की रानी है,
बात सरासर झूठी है।
झूठी है जी झूठी है,
सारी नदियां सूखी है।
सूखी है भई सूखी है,
नहर बावड़ी सूखी है।
अब पीने को पानी ना,
मछली जल की रानी ना।
‌‌ रानी ना जी रानी ना,
ताल तलैया पानी ना।
प्रभो, हमको पानी दे,
पानी दे जिंदगानी दे।
सब बच्चों ने जोड़े हाथ,
बादल हमको दे बरसात।
राजूराम बिजारणियां

राष्ट्रीय पक्षी मोर

Bal Kavita

किस कदर सुन्दर मनोहर,
लगता है ये मोर।
गगन में घन देख कर,
नाच उठता है मोर।।
इसके मस्तक पर,
सुसज्जित कलगी प्यारी।
इसके परों की आभा,
भी कितनी निराली।।
अपने मुकुट में प्रभु भी,
सजाते हैं इसका पंख।
राजा इसकी आकृति का,
बनवाते हैं सिंहासन।।
कें, कें करके गुंजरित,
करता है ये वन।
इसकी शोभा से सुशोभित,
होते हैं उपवन।।
कीट, सर्प, फल-फूल,
का है मोर पक्षी।
मोर भारत का बना है,
राष्ट्रीय पक्षी।।
रेनू भटनागर

हाथी आया झूम कर

Bal Poem

हाथी आया झूम कर,
गली-मुहल्लों में घूमकर।
लम्बी सूंड घुमाता,
चौड़े कान हिलाता।
आंखें है इसकी छोटी,
मनों कांच की हो गोटी।
खंभे जैसे पांव है चार,
हाथी चले बीच बाजार।
पूर्णिमा मित्रा

चंदा मामा

Bacchon Ke Liye Kavita

चन्दा मामा चन्दा मामा
रात में क्यों तुम आते हो
दिन भर कहीं घूमते रहते,
धूप से या डर जाते हो।
उजला उजला रँग तुम्हारा
कहीं न काला पड़ जाए।
दिन में छिप कर रहते हो क्या
छाला कहीं न पड़ जाए।
सूरज जैसे घर को जाता,
झट बाहर आ जाते हो
अपने संग हजारों तारे
आसमान बिखराते हो।
मेरी सारी गर्मी हरते
ठंडी हवा चलाते हो
पानी से नहला कर इनको
ठंडा ठंडा बनाते हो।
माँ कहती मामा हो सबके,
फिर भेट नहीं क्यों लाते हो।
कभी कभी पूरे दिखते हो
कभी कहीं छिप जाते हो।
गीता गुप्ता

कौआ और लोमड़ी

Bal Kavita In Hindi

कौआ रोटी कहीं से लाया,
रखकर मुंह में वह हर्षाया,
तभी आ गई वहाँ लोमड़ी,
मन उसका भी था ललचाया।
कहे लोमड़ी कौआ भइया।
कूक राग के तुम्हीं गवैया
कोई नया राग तुम छेड़ो
नाचेंगे हम ता ता थैय्या।
बातों में फिर कौआ आया,
कोयल बनने को ललचाया,
चोंच खोलते रोटी गिर गयी,
जिसे लोमड़ी ने चट खाया।
ठग जाने ठग ही की भाषा,
लेकिन कौआ समझ न पाया
एक बार जब अवसर आया,
बुद्धिमान ने धोखा खाया।
डॉ. प्रदीप चित्रांशी

चींटी रानी

Bal Poem In Hindi

चींटी रानी चींटी रानी
कर्मठता का ना कोई सानी।
हर पल चलती रुकती ना जो
सतत प्रयत्न की जिसने ठानी।
स्वार्थ जिसको छू ना पाता
उसका सहकार से नाता।
जीवन जीने की रीति सुहानी
चींटी रानी चींटी रानी।
मिलकर खाती ना उकताती,
बीस गुना जो वजन उठाती।
करती ना वो कभी मनमानी
चींटी रानी चींटी रानी।
संचय करना जिसे सुहाता
लीक से हट चलना ना आता।
मीठे की जो रही दीवानी
चींटी रानी चींटी रानी
व्यग्र पाण्डे

जमकर मौज मनाते मेंढक

Bal Kavita

हैं बारिश में आते मेंढक।
टर्र-टर टर्राते मेंढक।।
लाख किवाड़े बन्द करें हम-
जाने कब घुस जाते मेंढक?
मेरा घर लगता है प्यारा।
शायद उनको बेहद न्यारा।।
पर मम्मा देखें जो उनको-
चढ़ जाता है उनका पारा।।
हुश-हुश-हश-हश हम करते हैं,
लेकिन कहीं न जाते मेंढक।।
कहीं मेज के दिखते नीचे।
पड़े हुए हैं अँखियाँ मींचे।।
कहीं किसी कीड़े को पाकर-
जीभ लपालप उसको खींचे।।
खुद को गायक बड़ा समझते,
राग बेसुरा गाते मेंढक।।
बड़ी-बड़ी आँखें चमकाते।
मानो ज्यों हों हमें डराते।।
कुछ तो गब्बर सिंह बने हैं-
लेकिन कुछ खुद ही डर जाते।।
इधर उछलते उधर फुदकते
जमकर मौज मनाते मेंढक।
जब बारिश गायब हो जाती।
इनकी तनिक नहीं चल पाती।।
ये भी तब गायब हो जाते-
याद हमें तब इनकी आती।।
आस-पास हम खोजा करते
ढूँढे कहीं न पाते मेंढक।।
गौरव वाजपेयी ‘स्वप्निल

नेताजी

Bal Kavita In Hindi

एक बहुत मोटा सा बंदर,
अपनी टोली का वह नेता।
पेड़ से वह ढेरों फल तोड़े,
टोली के लोगों को देता।
टोली संग ही वह चलता,
आगे ही बढ़ कर रहता।
ढेला व पत्थर से कोई मारे,
पहले खुद ही वह सहता।
बच्चे जब भी उसे चिढ़ाते,
कुछ बच्चों को न कहता।
बड़े उसे जब मारने आते
तब काटने को वो दौड़ता।
टोली के संग ही,
पेड़ों पर मस्ती वह करता।
आम अमरुद अंगूर सभी,
मिल बांट कर वह खाता।
लाल देवेंद्र कुमार

बिटिया रानी

Bal Kavita

मेरी बिटिया रानी
कर पढ़ाई तू मन से
डरना मत
कभी भी किसी से
तू भी एक दिन
तारों की तरह चमकेगी
भी एक दिन
मुश्किलों से जीतेगी।
मेरी बिटिया रानी
जीवन के हर मोड़ पर हंसना
चाहे हो मुश्किल
तुम मुस्कारते रहना।
मेरी बिटिया रानी
तुम्हारी जिंदगी में भी
आयेंगी बाधाएं यकीनन
पर रखना यह विश्वास खुद पर
बाधाएं होती हैं
चंद दिनों की मेहमान
रखना इस बात का सदैव ध्यान।
संदीप कुमार

सर्दी आई

Bal Kavita In Hindi

सर्दी आई, आई सर्दी,
ठंड की पहने वर्दी।
सबने लादे ढेर से कपड़े,
चाहे दुबले चाहे तगड़े।
नाक हो गई लाल,
सुकड़ी सबकी चाल।
अधिराज सिंह राजावत

सच बोलो

Bal Kavita In Hindi

मुख जब खोलो,
सच-सच बोलो,
सच से फिर तुम
कभी भी न डोलो।
झूठ हमेशा
जमकर हारा,
सच का जब भी,
खुला पिटारा।
झूठ लुभाता,
सत्य डराता,
सबको फिर भी,
सच ही भाता।
सत्यमेव
जयते का नारा,
क्या जाने ये
झूठ बिचारा।
सत्य की जीत,
झूठ की हार
ऐसा होता,
हर इक बार।
महेंद्र कुमार वर्मा

स्कूल चले हम

Bal Kavitaen

स्कूल चलें हम, स्कूल चलें
सब मौज मस्ती भूल चलें,
अब आयी बारी पढ़ने की,
भविष्य अपना गढ़ने की।
नई किताबें नई हैं पैंसिल
बेमतलब की छुट्टी कैंसिल,
पिछले बरस से भी अच्छे
अंक लाएंगे हम सब बच्चे।
नया-नया जमेट्री बॉक्स है
नया-नया है बस्ता सबका,
स्कूल भेज रहा बच्चों को
भारत का हर इक तबका।
मैडम जी ने उम्मीद जताई
करेंगे हम सब खूब पढ़ाई,
छुट्टियों के दिन बीत चलें
स्कूल चलें हम स्कूल चलें।
पुखराज सोलंकी

मन करता है

Short Bal Kavita In Hindi

मन करता है सूरज बनकर,
आसमान में दौड़ लगांऊ।
मन करता है चंदा बनकर,
सब तारों पर अकड़ दिखाऊं।
मन करता है बाबा बनकर,
घर में सब पर धौंस जमाऊं।
मन करता है पापा बनकर,
मैं भी अपनी मूंछ बढाऊं।
मन करता है तितली बनकर,
दूर-दूर उड़ता जाऊ।
मन करता है कोयल बनकर,
मीठे-मीठे बोल सुनाऊं।
मन करता है चिड़िया बनकर,
ची-चीं चूं-चूं शोर मचाऊं।
मन करता है चर्खी लेकर,
पीली-लाल पतंग उड़ाऊ।
सुरेन्द्र विक्रम

धरती स्वर्ग बनाएँ

Bal Kavita In Hindi

बच्चे हम नन्ने-मुन्ने
आगे बढते जाएँ,
भेदभाव नहीं रखें
साथ खेले खाएँ।
पढ़-लिखकर हम अपना
जीवन सुखी बनाएँ,
दुनिया की चिन्ताएँ फिर
कैसे हमे सताएँ।
हम ही जीवन की बाती
अंधकार को दूर भगाएँ,
अपने घर की ज्योति बन
खुशियाँ खूब लुटाएँ।
नफरत की दीवार गिरा कर
सबको गले लगाएँ,
सब आपस में प्यार बांटकर
धरती स्वर्ग बनाएँ।
अब्दुल समद राही

बाल कविता

Bal Kavita In Hindi

बस्ते का ढोना पड़ता है
हमको प्रतिदिन बोझ।
नखरों पर भी, विद्यालय को
जाना पड़ता रोज।
खूब मस्तियाँ करने के हम
देखा करते ख्वाब।
किंतु उठानी पड़ती हमको
मोटी- छपी किताब।
डाँट लगाती हैं मम्मी जी
हमको सुबहो-शाम।
बाकी रह जाता है जब भी
विद्यालय का काम।
अनुज पाडेय

जल की रानी

Baccho Ki Bal Kavita

एक मगरमच्छ पानी में
लपक रहा था मछली,
चकमा देकर मछली भागी
मजा चखाया असली।
खूब छकाया, खूब थकाया
आई न उसके हाथ,
नन्ही-सी मछली ने दे दी
मगरमच्छ को मात।
पानी में अब मगरमच्छ जी
घात लगाकर बैठे,
मछली के चक्कर में उसने
दस केकड़े ऐंठे।
समझ गये थे मगरमच्छ जी
मछली बड़ी सयानी,
इसीलिए जग सारा कहता
मछली जल की रानी।
पुखराज सौलंकी

बादल भैया आयेंगे

Bal Kavita

गुस्सा थूको, सूरज दादा।
क्रोध नहीं अच्छा है ज्यादा।।
छप्पर छानी छायेंगे।
छाया में बैठायेंगे।।
तंग पसीना करने आता।
चिपचिप चिपचिप खूब मचाता।।
दिन में चैन न पायेंगे।
रातें टहल बितायेंगे।।
संग हवा के चले गये हैं।
बादल भैया छले गये हैं।।
शादी करके आयेंगे।
दुल्हन प्यारी लायेंगें।।
खूब मचेगी धूम-धड़ाका।
तड़-तड़तड़-तड़तड़क-तड़ाका।।
बाराती बन जायेंगे।
गीत खुशी के गायेंगे।।
जीभ अधर पर फेर रही है।
विद्युत दमक बिखेर रही है।।
बादल भैया आयेंगे।
वर्षा रानी लायेंगें।।
दिलीप कुमार पाठक “सरस”

चिड़िया बोली

Bal Kavita Hindi Mein

सुबह हुई तो चिड़िया बोली
उठो-उठो प्यारी गुडिया!
तुम्हें जगाने आई देखों
परी लोक से मैं चिड़िया।
सूर्यदेव ने फैलाई हैं
सुन्दर-सी स्वर्णिम किरणें।
सारे जग पर एक सवेरा
सुन्दर पुनः लगा तिरने।
उठ जाओ, ओ प्यारी गुड़िया!
बनो न आलस की पुडिया।
ताजी हवा चल रही सन-सन
प्राणवायु बाँटे सबको।
उठो और अपने पर खोलो
उठो और छू लो नभ को।
जाओ! चलो! नहाओ-घोओ
और पढ़ो फिर ओ कुड़िया।
ज्ञान भरी ये गजब किताबें
काश! कभी मैं पढ़ पाती।
चिड़िया हूँ गुड़िया होती तो
मैं भी आगे बढ़ पाती।
हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी
और कभी पढ़ती उड़िया।
फिर भी भाए मुझे चहकना
जी भर कर मुस्कती हूँ।
जीवन जो पाया ईश्वर से
मस्त चहकती जाती हूँ।
पढ़-लिखकर तुम खूब चहकना
और महकना ओ गुड़िया।
गौरव वाजपेयी

बरसे पानी

Bal Poem

बिजली चमके कड़-कड़-कड़,
मेघा गरजे गड़-गड़-गड़।
झींगुर करते सी – सी – सी,
मेढक करते टर- टर – टर।
झूमे तरुवर मस्ती में,
चले पुरवैया सर-सर-सर।
धरती की प्यास बुझाने,
बरसे पानी झर झर – झर।
केशव दिव्य

किसान गिलहरी

Bal Poem In Hindi

चली गिलहरी खेती करने
कौआ काका नहीं मिला
खेती अब वह जोते कैसे
हल, हलवाहा नहीं मिला।
गयी गिलहरी भालू के घर
ट्रैक्टर के लिए किया आग्रह
किसी तरह से जोतवाया
पर जोताई के पैसे कहां मिले।
सब कुछ महंगा तेल भी महंगा
हुई जोताई बहुतै महंगा
राजा शेर सिंह को अर्जी डाला
कुछ भी उत्तर नहीं मिला।
गिलहरी ने एक बैठक बुलायी
जंगल के सब रहे किसान
भालू, चीता अरू लोमड़ भाई
खबर मिली शेर सिंह को
गुस्साये भौंहे तान।
लगा दिया है पोटा सब पर
जितने थे जंगल के किसान
खेती सारी परती हो गयी
हाल बेहाल सब हुए किसान।
सतीश बब्बा

कविता में व्याकरण

Bal Kavita In Hindi

संज्ञा होती है सदा, किसी वस्तु, 
स्थान, व्यक्ति का नाम।
यमुना तट पर रास रचाते, 
जैसे हो घनश्याम।।
कार्य करे संज्ञा का, 
वह सर्वनाम कहलाता है।
किसका कौन कहाँ मैं और तू, 
यह सब झूठा नाता है।।
संज्ञा की विशेषता कहते हो, 
वे गुण या दूषण।
छोटा मोटा गुणी श्रेष्ठ, 
कहलाते सभी विशेषण।।
क्रिया बताती सदा कार्य का 
होना हो या करना।
शाम खेलना किन्तु सुबह 
उठकर है लिखना पढ़ना।।
जो विशेषता कहे क्रिया की 
होता क्रिया विशेषण।
बहुत शीघ्र जाना है हमको, 
या दो बढ़िया भोजन।।
जो सम्बंध बताते वह है 
संबंधों के सूचक।
राजा का बेटा चाहे 
उसकी नियुक्ति हो बेशक।।
वाक्य शब्द जोड़े काटे 
जो वही समुच्चय बोधक।
किशन और राम झगड़े, 
रखी मेज पर पुस्तक।।
विस्मय हर्ष आवेगों को 
जो दर्शाते हैं।
विस्मय बोधक, 
हे प्रभु! ओफ! आह! कहलाते है।।
इसीलिए मनोज जी कहते, 
शब्दो के यह भेद।
आठ हैं पूरे, गिन कर देखो, 
शब्दो के यह भेद।।
मनोज कश्यप


बच्चे की अभिलाषा

Bal Kavita In Hindi

अभी तो चलना सीखा
सीखा नहीं है बतियाना,
कुछ दिन करने दो नादानी
अभी नहीं मुझको पढ़ना।
हँसने दो खेलने दो
खुले आसमान में उड़ने दो,
मत करो बंद पिंजरे में
मेरे सुंदर से बचपन को।
कुछ दिन यूँ ही रहने दो
मिट्टी का रंग भी चढ़ने दो,
पानी में हो अपनी नाव
हवा में जहाज उड़ाने दो।
जहाँ मम्मी मुझे पढ़ाए
ना हो ट्यूशन जाना,
गर पापा मुझे डाँट लगाएँ
दादी करे कोई बहाना।
होमवर्क हो जहाँ थोड़ा सा
थोड़ी सी हो किताबें,
भारी बैग नहीं उठाना
ऐसा हो स्कूल अपना।
रंजना डुकलान

बाल कविता

Bacchon Ke Liye Kavita

अगर जानती गाना तितली
लिए तानपुरा फिरता
तब पवन बाग़ में
पत्तों का तबला भी
बजता संग राग में।
कान फूल सब लगवा लेते
अगर जानती गाना
तितली।
मोर नाचता पैरों में
धुंघरू बंधवा कर
डेरा वहीं डालता
काला भौंरा जा कर।
अजब हाल कोयल का
होता
अगर जानती गाना
तितली।

रेल

Bal Kavita Hindi Poems

छुक-छुक आती-जाती रेल
पों-पों हॉर्न बजाती रेल।
इस डिब्बे से उस डिब्बे में,
आपाधापी ठेलमठेल रेल।।
दो पटरी पर चलती रेल,
सरपट दौड़ लगाती रेल।
गेट पर बैठा टाइमकीपर,
लाल, हरी झंडी दिखाती रेल।।
खानों से कारखानों तक
झटपट आती-जाती रेल।
माल ढोकर आती रेल,
ढोकर माल जाती रेल।।
बच्चे मन के होते सच्चे,
खेल रेल का खेलमखेल।
मुन्नी बिटिया बड़े मजे से
सफर करती रेलमरेल।।
सामान ढोना हुआ आसान,
आसान हुआ आवागमन।
आय के हैं प्रमुख साधन,
देश की आय बढ़ाती रेल।।
महेन्द्र साहू’खलारीवाला’

सूरज और हवा

Bal Kavita In Hindi

चिडिया बोली तितली डोली,
बच्चों ने अब आँखें खोली।
सूरज ने किरणें बिखराई,
शुद्ध हवा ने ठंडक घोली।
डाली में कलियाँ शरमाई,
तोते ने भी टेर लगाई।
डूबा चंदा तारे छिप गये,
मेंढक भी अब टर्र-टर्र बोली।
फूलों ने अब चूंघट खोला,
काँव-काँव कर कौआ बोला।
फुदक रहा है बछड़ा देखो,
में में करती बकरी भोली।
हिलमिल कर रहते हैं सारे,
धरती माँ के बच्चे प्यारे।
अच्छा काम हो नाम बड़ा,
यह कहते माँ हँसकर बोली।
कमल सिंह चौहान

जादू की छड़ी

 Bal Poem In Hindi

लंबी, काली, ठिठुरन वाली रातें
बीत जाती, जैसे कल की हो बातें।
सूरज की गर्मी फिर सताती है
मेघों की बरबस याद आती है।
उत्सुक हो मां से पूछता हूं
यह जादू की छड़ी कौन चलाता है।
बदल जाते हैं कैसे मौसम प्यारे
दिन को सूरज और रात को तारे।
भरता है फूलों में रंग कौन
पंछी को गाना सिखलाता कौन।
मां बतलाती, ईश्वर की लीला गूढ़
मैं अज्ञानी, ठहरा फिर भी मूढ़।
जिद करता, ईश्वर मुझे दिखलाओ
चांद वहां क्यों, मेरे पास लाओ।
कविता विकास

मिलकर सोचें

Bal Poem

मिलकर बैठें, मिलकर सोचें,
बातें करें विकास की।
आपस में हो भाईचारा।
मन हो ज्यों मन्दिर-गुरुद्वारा।
रहे भावना भरी मनों में,
मस्ती औ’ उल्लास की।
अलग-अलग हों रंग सभी के।
अलग-अलग हों ढंग सभी के।
फिर भी रहे एकता सब में,
डोरी हो विश्वास की।
नापें धरती उड़ें गगन में।
संकल्पों का बल हो मन में।
स्वर्ग बनाना है धरती को,
आशा करें उजास की।
डॉ. रामनिवास ‘मानव’

बया पंछी

Bal Kavita

बया पंछी बड़ा ही प्यारा,
दूर-दूर तक जाता।
अपना सुंदर नीड़ बनाने,
तिनके चुनकर लाता।
लालटेन-सा नीड़ पेड़ पर,
हरदम रहता लटका।
वर्षा-आंधी या आतप हो,
नहीं किसी का खटका।
नन्हा-सा यह बया सयाना,
बुनकर भी कहलाता।
मेहनत और लगन से अपना,
अनुपम नीड़ बनाता।
बया घोंसला बुनता रहता,
गीत खुशी के गाता।
जीवट से जीवन जीने की,
सबको सीख सिखाता।
उदय मेघवाल

करते तुम्हें प्रणाम

Bal Kavita In Hindi

आलस हमको घेरे रहती
ठहरे हैं सब काम
जुगत बताओ हाथी दादा
करते तुम्हें प्रणाम।
सुबह-सुबह उठकर करना है
मात-पिता का ध्यान
“सूर्य नमन” के बारह आसन
हैं कितने आसान।
रहना सदा निरोग अगर है
करना प्राणायाम
जुगत बताओ हाथी दादा
करते तुम्हें प्रणाम।
नीड़ बनाती कैसे चिड़िया
मधुमक्खी है छत्ता
कैसे चूहे माँद बनाकर
रहते हैं अलबत्ता।
ऐसी हुनर हमें क्या मालूम
जाने अल्ला-राम
जुगत बताओ हाथी दादा
करते तुम्हें प्रणाम।
पेन्टर मदन

कहां खो गये हम

Bal Kavita In Hindi

यह दुनिया थी कितनी सुंदर
जब पानी जैसा
साफ था नीला समंदर
अब तो कचरा है।
दुनिया में यहां-वहां
यह खो गये हम कहां
जब सच्चे थे सबके इरादे
जुड़े थे दिल से सबके नाते।
अब तो जहर है
उगलता सबके यहां
कुछ नहीं सोचते
लालच के अलावा
सबकुछ तो।
लिख रहा है ऊपरवाला
हो गया कलयुग
यह सारा जहां
यह खो गये हम कहां।
रितोश्री कार

मन भावन जामुन

Bal Kavita

खट्टी-मीठी बड़ी रसीली,
मनभावन जामुन।
गर्मी के मौसम में आती,
खाकर खुश हो जाता मन।
बैंगन जैसा रंग है इसका,
काली-काली दिखती स्याम।
इम्युनिटी भी बहुत बढ़ाती,
रोग का नहीं कोई है नाम।
चमत्कार इसका तुम देखो,
खाते ही हो जाती आंखें बंद।
नमक से स्वादिष्ट बन जाता,
खाओ इसको रोज रजामंद।
राजमन, जमाली, ब्लेकबेरी,
अलग प्रांत में इसके नाम।
कई रोगों में काम आता,
इसका प्यारा जामुन नाम।
डॉ नवीन दवे मनावत

कुत्ते से भिड़त

Bal Poem

खेल रहे थे हम
अपनी गली में क्रिकेट
बदनसीबी तो देखो
टूट गया विकेट
जोश में मार दिये।
जोर का हम चौका
नुक्कड़ पर बैठा कुत्ता
भाऊ-भाऊं कर भौंका
कुत्ता बोला- अब तो हम
लेकर रहेंगे बदला।
एक सीटी पर ही
चार और को बुलाया
पूरे मोहल्ले में खूब
हमको वह भगाया।
बोला वह- लेना चाहिए
बराबर से ही पंगा
वरना उसके साथ नहीं
कुछ भी होगा चंगा।
गणपत हिमांशु

चंदा मामा

Bacho Ki Kavita In Hindi

चंदा मामा आओ ना।
संग अपने ले जाओ ना।
आसमान में ढेरों तारे।
झिलमिल-झिलमिल करते सारे।
नीले-नीले अंबर की,
मुझे भी सैर कराओ ना।
चंदा मामा आओ ना।
संग अपने ले जाओ ना।
बादल काका चलते जाते।
घुमड़-घुमड़ कर नाच दिखाते।
जाकर बीच बादलों के,
आंख-मिचोली खिलाओ ना।
चंदा मामा आओ ना।
संग अपने ले जाओ ना।
रैन बसेरा यहाँ जमाते।
दिन में कहां सैर पर जाते?
इसका राज जरा हमको,
जल्दी-जल्दी बताओ ना।
चंदा मामा आओ ना।
संग अपने ले जाओ ना।
रीनू पाल

उन्मुक्त गगन के पंछी

Bal Kavita

वह देखो उन्मुक्त गगन में
खग कैसे अपने पंख लहरा रहे
मंडरा रहे बादलों के जैसे
बिजली-सी कलाबाजियां खा रहे।
उन्हें नहीं है कल की चिंता
किसी की माल हड़पकर खाने की
उन्हें नहीं तनिक भी जल्दी
गगनचुंबी अट्टालिकाएं बनाने की।
जिधर जी करता उड़ जाते हैं
चुग दाना वापस नीड़ चले आते हैं
जो थक जाते अगर कभी तो
जहां आश्रय मिला वहीं सो जाते हैं।
मानव क्यों पग में बेड़ी डाले
कुढ़-कुढ़ कर अपना जीवन जीता है
रखकर गिरवी अपनी आत्मा
वह लोभ-लालच का गरल पीता है।
तोड़ के मोह-माया का बंधन
उन्मुक्त गगन के पंछी बन जाओ
भूल के कल की चिंता मानव
जल्दी बंदी जीवन से मुक्ति पाओ।
गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम
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