Top 51+ Best Hindi Short Moral Stories For Class 1~ प्रसिद्ध नैतिक कहानियां

Moral Stories In Hindi For Class 1 :- यहां मैं प्यारें बच्चों के लिए Top 51+ Best Hindi Short Moral Stories For Class 1~ प्रसिद्ध नैतिक कहानियां पर आधारित कहानियां का संग्रह प्रस्तुत करने जा रहा हूं। यह कहानियां शिक्षकों और लेखक द्वारा लिखी हुई है। इस कहानियों के माध्यम सेे बच्चों के मन में नैतिक शिक्षा के साथ ही साथ नवाचार एवं गुणवत्ता बढ़ाने में भी मदद करेगा। चलिए बिना देरी किए इन कहानियों को पढ़ते हैं।

प्रेम ही सच्ची भक्ति है

 Moral Stories In Hindi For Class 1

किसी गाँव में एक लड़की रहती थी। लड़की के माता-पिता उसे बचपन में ही छोड़कर चल बसे थे। वह गांव के तालाब के पास छोटी सी कुटिया में रहा करती थीं। उस गाँव के बाहर स्वामी जी का आश्रम था। वह लड़की नित्य प्रतिदिन स्वामी का प्रवचन सुनने जाया करती थी। और आश्रम में जितने प्रकार के कार्य होते थे। उसमें में वह लड़की अपनी भूमिका जरुर निभाती थी। 

स्वामी जी उस लड़की के छोटी सी उम्र में इतना साहस भरी कार्य को देखकर अति प्रसन्न रहते थे। जब आश्रम में सभी काम खत्म हो जाया करते थे। वह लड़की अपने घर की तरफ लौट जाती थी।

एक दिन वह लड़की स्वामी जी आश्रम में गईं। स्वामी जी को आदर सत्कार करने के बाद कहा कि, ” स्वामी महाराज आप ईश्वर के परम भक्त हैं” मैं आपके द्वारा दी हुई सभी आध्यात्मिक ज्ञान को अपने जीवन में अपनाया हूं। मेरे माता-पिता बचपन में ही छोड़कर चले गए। और नहीं मेरा कोई भाई हैं। जब मैं अपने गांव की ओर लौटती हूं तो सारा बच्चे मुझे अनाथ कहकर चिढ़ाते हैं। 

स्वामी जी मुस्कुराएं और कहें कि यह दुनिया का वास्तविक सत्य है जिसके पास जो चीजें रहती हैं जैसे धन या परिवार मनुष्य उसका आदर कभी भी नहीं करता है लेकिन वही चीजें नहीं होने पर उन्हें अकेला महसूस होता है।

स्वामी जी ने उस लड़की को कृष्ण भगवान की एक मूर्ति दिए और कहें कि यह तुम्हारा छोटा भाई हैं। इसे तुम लालन-पालन करना। जब भी तुम्हें घर पर अकेला महसूस हो अपने भाई से बातचीत करना। वे तुम्हारी हर संकट में मदद करेंगे। 

वह लड़की भगवान कृष्ण की मूर्ति को लेकर अपने घर चली जाती है। गांव के सभी बच्चों को कह कह कर दिखाती थी कि देखों मेरा भाई आया है। और गांव के बच्चे उस लड़की पर हंसते थे और कहते हैं कि इस पत्थर के मूर्ति को यह पगली अपना भाई समझती है। लड़की बिना किसी को कहें घर में चली गई।

बाल गोपाल की मूर्ति को वह नित्य सुबह उठती उस मूर्ति को नहाती, भोजन कराती और जब अकेली बैठती तो उस मूर्ति से सारा समय बातचीत करती।

एक समय वह मूर्ति को लेकर अपने घर के बाहर बैठकर खेल रही थी। और गांव के कुछ शरारती बच्चे ने उस लड़की से कहा कि तुम्हें नहीं मालूम गांव में एक भेड़िया आया हुआ है और छोटे छोटे बच्चों को लेकर चला जाता है और उन्हें मारकर खा जाता है। और तुम अपने छोटे भाई का ख्याल रखना। इतना कहकर शरारती बच्चे वहां से चले जाते हैं।

लड़की ने अपने बाल-गोपाल की मूर्ति को अपने कुटिया मे विराजमान किया और अपने भाई से कहा कि, घबराओं मत, मैं तुम्हारी रक्षा करुंगी। वह तुरंत दरवाजे पर पहरा देने लग जाती हैं।

अपने छोटे भाई को जंगली भेड़िया से बचाने के लिए वह दिन रात भूखी उसी तरह खड़ी रही। भगवान कृष्ण ऊपर से अपने नन्हे भक्त को देखकर मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। लड़की की अटूट आस्था और विश्वास को देखकर भगवान कृष्ण ने एक छोटे-से बालक का रूप धारण किया और पृथ्वी लोक पर उस लड़की के पास चलें आए।

वे लड़की के घर के पास खेलने लगें और कहें कि तुम भी आओं बहन एक साथ खेलेंगे। लड़की ने कहा कि नहीं मैं अपने भाई की रक्षा कर रही हूं। गांव के बच्चे ने कहा है कि जंगल से गांव में कोई भेड़िया आया हुआ है। तब छोटे लड़के ने कहा कि, “यह मिथ्या झूठ है गांव में कोई भेड़िया नहीं आया हुआ है। गांव के बच्चे ने तुम्हारे साथ शरारत किए हैं। 

भगवान कृष्ण अपने स्वयं रूप में आ गए और लड़की से अटूट प्रेम और आस्था को देखकर उसको अपने निज धाम ले गए। याद रखिए प्रभु को पाना है तो उनके प्रति अपने मन में भक्ति, सेवा, निष्पक्ष प्रेम भावना रहना चाहिए। जब हम पूरी तरह निर्मल होकर अपनी पवित्रता और शांति स्थापित करें तो एक दिन निश्चय ही हम उनकी की दर्शन जरुर पा सकते हैं।

मछुआरे की सफलता 

Hindi Story For Class 1

समुद्र के किनारे पर एक द्वीप बसा हुआ था। उस द्वीप पर रहने वाले व्यक्तियों को मछली खाना बेहद ही पंसद था। उस द्वीप पर कोई भी मछली का व्यापार नहीं करता था। वहाँ के कुछ मछुआरे ने सोचा कि क्यों न मछली पकड़ कर उन्हें बेचने की व्यापार शुरू किया जाए ?

अगले दिन कुछ मछुआरे ने समुद्र के तट पर जाकर मछलियाँ पकड़ने लग गए। और पकड़ कर उन्हें उस द्वीप के बाजार में बेच दिया करते थे। और इसके बदले उन्हें बढिया मुनाफा भी मिल जाता था। इस प्रकार से उस द्वीप पर मछुआरों को मछली पकड़ना और बेचना उनका मुख्य व्यवसाय भी बन गया था । वे प्रतिदिन समुद्र के तट पर मछलियाँ पकड़ते और उन्हें बाजार में बेच दिया करते थे। इस तरह से उनका व्यापार चलता रहता था । लेकिन कुछ दिनों के बाद समुद्र के किनारों पर मछलियाँ धीरे-धीरे खत्म होने लग गई। 

 मछुआरे अब अपने जहाज से समुद्र के कुछ दूरी पर जाकर मछलियाँ पकड़ने लग गए और पकड़ने के बाद पुनः बाजार में बेच दिया करते थे। उनका मछलियों का व्यापार पहले की तुलना में बहुत ही बढिया ढंग से चल रहा था । 

लेकिन किस्मत की बात यह है कि जहाँ वे मछलियाँ पकड़ने जाते थे । वहाँ भी कुछ महीनों के बाद मछलीयों की संख्या धीरे-धीरे खत्म होने लग गई । 

मछुआरे अपने नाव की जहाज को ओर आगे की ओर लेकर जाने लगे । कुछ समय से वहाँ भी सही चल रहा था । परन्तु कुछ दिनों के बाद वहाँ भी मछलीयाँ खत्म हो चुकी थी । 

सभी मछुआरे ने एक योजना बनाई की हम लोग बार – बार कुछ ही दूरी पर मछलियाँ पकड़ते हैं । इसलिए मछलियाँ बार – बार खत्म होती जा रही हैं । 

सोच – विचार करने के बाद अब मछुआरे ने मछलियाँ पकड़ने के लिए अपने नाव की जहाज बहुत दूर ले जाते थे । जिस तरह से उन्हें मछलियाँ काफी ज्यादा ही मिल जाती थी । और इस तरह से उन्हें व्यापार में पहले से ज्यादा और मुनाफा होने लगा ।  

लेकिन उन्हें समस्या छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। वे मछलियाँ पकड़ने तो बहुत दूर दूर तक निकल जाते । लेकिन आपस आने में उन्हें बहुत दिन तक लग जाते थे। जिस तरह उनकी आधी मछलियाँ मर जाती थी । 

उस द्वीप पर रहने वाले लोग मरी हुई मछलियाँ खाना पंसद नहीं करते थे । इस तरह से मरी हुई मछली कोई भी नहीं खरीदता और उनके व्यवसाय में भी हानि पहुँचने लग गया । 

अब समस्या से निपटने के लिए मछुआरे अपने जहाज पर एक फ्रिजर ले कर जाने लग गये । और वो मछलियों को पकड़ते और उन्हें फ्रिजर में डाल देते थे। जिससे उनकी मरने की संभावना बहुत ही कम होती थी । 

फिर भी बाजार में खरीदने वाले लोग ताजा और फ्रिजर में रखी हुई मछलियों का अंतर समझ जाते थे। और फ्रिजर में रखी हुई मछलियों को खरीदने से इंकार कर देते थे । 

जिससे मछुआरे के व्यापार में फिर से हानि होने लग जाती हैं । उनके पास एक और नई समस्या उत्पन्न होने लगता है । उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था लोगों के बीच ताजगी भरी मछलियाँ कैसे लेकर आया जाए ? 

सुझ-बुझ के बाद मछुआरे अपने जहाज पर एक मछली का टैंकर ( मछली का घर ) बना दिये । वे अब मछलियाँ पकड़ते और उसे फिश टैंकर में डाल देते थे । उससे मछलियाँ पहले की तरह जिंदा रहती और उनके अंदर ताजापन भी बना रहता था । इस सुझ बुझ से मछलियाँ बाजार में बहुत ही तेजी से बिकने लग गई । 

कुछ दिनों के बाद मछुआरे के व्यापार में फिर से गिरावट आने लग गई । 

मछुआरों ने जब अपने ग्राहकों से बातचीत किया तो यह पता चला कि जब मछलियाँ फिज टैंकर में रहती है । तो उनमें कुछ समय तक ही जिंदा रहने की उम्मीद रहती हैं । उसके बाद वे ठंडी पर जाती हैं और ठंडी पड़ जाने से जीने की उम्मीद ही छोड़ देती हैं । फिज टैंक में मछलियों को जोश और उत्साह नहीं मिलने पर निढाल और बेजान सी दिखाई पड़ती हैं जो कि समुद्र के जिंदा मछलियों की तरह नही होती हैं । इसी कारण से मछलियों में भारी मात्रा में गिरावट आ रही हैं । 

मछुआरों ने इस बात को सुनकर हैरान हो गए और उनके पास एक बहुत ही बड़ी समस्या आ गई थी ।  

लेकिन कुछ दिनों के बाद इस समस्या का निवारण भी निकाल लिए थे । वे जानते थे कि समुद्र में बड़ी मछली और छोटी मछली के बीच हमेशा दुश्मनी बनी रहती हैं। दुश्मनी का कारण था कि बड़ी मछली हमेशा छोटी मछलियों को खा जाती थी । इसलिए छोटी मछलियाँ अपने आप को बचाने के लिए हमेशा इधर से उधर भागती रहती हैं । 

इस वजह से छोटी मछलियों के अंदर ताजगी और उत्साह बना रहता है । अब मछुआरे अपने फिश टैंक में मछलियाँ पकड़ने जाते और पकड़ने के बाद एक छोटी सी शार्क मछली को फिश टैंक में डाल देते थे । जिससे छोटी मछलियों के बीच लड़ाई होती रहती थी । और उस वजह से सभी मछलियाँ समुद्र के किनारे तक जिंदा और ताजगी बना रहता था । 

अब उनकी मछलियाँ बाजार में बहुत ही ज्यादा बिक्री करती और बिक्री करने के साथ उन्हें अब पहले से ओर मुनाफा होने लगता हैं । इस तरह से सभी मछुआरें पर संकट की घड़ी दूर हो गई । 

नैतिक शिक्षा: – इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि जीवन में संघर्ष का होना बहुत ही जरूरी होता हैं । अन्यथा बिना संघर्ष के जीवन उन बेजान मछलियों की तरह निढल हो जाएगा । अगर हम सभी के जीवन में संघर्ष ही नहीं रहेगा तो जीवन ठंडा और बिना रस के फिका पड़ जाएगा । इस तरह का जीवन मरे हुए मछली के तरह सामान्य है । इसीलिए कहा गया है कि संघर्ष ही जीवन है और जीवन ही संघर्ष है । और प्रतिस्पर्धा हमें जीवन को निखारती हैं । 

Hindi Short Stories For Class 1

Moral Education : – The only lesson we get from this story is that struggle is very important in life. Otherwise life without struggle will die like those lifeless fish. If there is no struggle in the life of all of us, then life will be cold and fade without juice. This type of life is as common as a dead fish. That is why it is said that struggle is life and life is struggle. And competition enhances our lives.

मन का विचार 

Hindi Short Stories For Class 1

एक समय की बात है। आनंद नाम का एक गरीब आदमी रहता था। वह अपने गरीबी से बहुत ही परेशान रहता था। वह किसी तरह से दो वक़्त का रोटी का ही व्यवस्था करने में उसका दिन-भर का समय निकल जाता था और वह दूसरा कार्य करने के बारे में सोचता तो इधर उसका परिवार भूखे ही रहकर सोना पड़ता था। इस तरह से उसका अपने परिवार का पालन- पोषण करना बहुत ही कठिन हो गया था।

आनंद के परिवार में एक पत्नि और तीन पुत्रों का भरण पोषण करना उसके लिए बहुत ही कठिन हो गया था। उसके मन में परिवार की बोझ लेकर हर दिन गलत विचार आते रहते थे। 

इसी कारणवश उसने परिवार का पालन पोषण से छुटकारा पाने के लिए घर छोड़कर भाग जाने का निर्णय किया। 

वह रात्रि के समय किसी को बिना बताए ही घर छोड़कर चला गया। आनंद चलते हुए एक घनघोर जंगल में पहुँच जाता है और एक पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करने लग जाता हैं। 

वह प्रात:काल उठकर अपने मंजिल की ओर चला जा रहा था। उसे रास्ते में भगवान बुद्ध और कुछ अन्य शिष्य एक पेड़ के नीचे बैठकर ज्ञान प्राप्त कर रहे थे। 

यह देखकर आनंद ने यह निर्णय किया कि अब मैं भी भगवान बुद्ध का शिष्य बनकर उनके साथ ही भ्रमित करने का फैसला किया। वह भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर यह विनती करने लग गया कि आप मुझे अपना शिष्य बना लिजिए।

भगवान बुद्ध आनंद के मस्तिष्क में पल रही विचारों को भली-भाँति ही ज्ञान की दृष्टि से देख चुके थे। भगवान बुद्ध ने आनंद को अपना शिष्य बना लिए और वही पर कुछ समय तक अपना ज्ञान प्राप्त किए। कुछ दिनों के बाद भगवान बुद्ध और उनके शिष्य उस स्थान को छोड़कर दूसरे रास्ते की ओर निकल पड़े। जिस रास्ते पर जा रहे थे। वह रास्ता बहुत ही लम्बा और पथरीला था।  

गर्मी का समय था। भगवान बुद्ध को काफी जोरों से प्यास लगी। वे अपने शिष्यों के साथ एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करने लग गए। 

भगवान बुद्ध ने अपने नए शिष्य आनंद से कहा, ” कि यहाँ पर नजदीक में एक झरना है तुम वहाँ जाकर झरने का पानी ले आओ। “

भगवान बुद्ध का आदेश सुनकर वह झरने का पानी लेने के लिए चला गया। जब वह झरने के पास पहुँचा तो उसने देखा कि झरने के पास से अभी-अभी ही कुछ बैलगाड़ियाँ गुजरी हुई है। 

बैलगाड़ियों के आने-जाने से झरने का पानी गंदा हो गया था। जिससे झरने का मिट्टी और सड़े-गले पत्ते बाहर उभर कर आ गए थे इतना गंदा पानी को देखकर आनंद बिना पानी लिए ही वापस आ गया और भगवान बुद्ध से कहा कि भगवन उस झरने के किनारे बैलगाड़ियों के आने-जाने से झरने का पानी बहुत ही गंदा हो गया है। उसे तो पिया ही नहीं जा सकता था।  

शिष्य आनंद की बात सुनकर भगवान बुद्ध मन ही मन मुस्काए और कुछ क्षण बीत जाने पर भगवान बुद्ध पुनः आनंद से कहा, ” कि तुम फिर से उसी झरने के पास जाकर पानी ले आओ। “

भगवान बुद्ध के कहने पर आनंद शिष्य पुनः उसी झरने के पास पानी लेने के लिए चला गया और वह मन ही मन सोच रहा था। भगवान बुद्ध इतने गंदे पानी को कैसे पी सकते हैं ? 

जब वह झरने के पास पहुँचा तो यह देखकर आश्चर्यचकित हो जाता हैं। झरने का पानी इतना निर्मल और स्वच्छ कैसे हो गया.

वह झरने से स्वच्छ पानी को लेकर भगवान बुद्ध के पास चला आता है और उनसे प्रश्न करने लग गया कि भगवन कुछ समय पहले ही झरने का पानी बहुत ही गंदा था लेकिन कुछ समय के पश्चात जैसे ही झरने के पास गया तो झरने का पानी बिल्कुल निर्मल और स्वच्छ दिखाई दे रहा है आखिर ऐसा कैसे हो सकता है ?

भगवान बुद्ध ने आनंद शिष्य मुस्कुराते हुए कहा कि जब झरने के पास बैलगाड़ियाँ गुजर रहा था। तब झरने का कीचड़ उभर कर उपर आ गया था परन्तु कुछ समय तक झरने का पानी शांत रहने पर कीचड़ वापस नीचे बैठ गया और उसका पानी फिर से निर्मल और स्वच्छ हो गया। 

ठीक इसी प्रकार हमारे मन की भी यही स्थिति होती है। हम सभी के रोजमर्रा के जीवन में अनेक प्रकार की भागम लगी रहती है और पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हमारे मन में भी बुरे विचारों की बैलगाड़ियाँ रोज आकर गंदा कर देती है और हम बुरे कार्य करने के लिए तत्पर हो जाते हैं और हम गलत निर्णय लेने में जल्दबाजी कर देते हैं। इसका परिणाम बेहद ही नुकसानदायक होता है।

अगर हम कोई भी निर्णय लेने से पहले हम अपनी मन को शांतिपूर्वक रखकर सोच विचार किया जाए तो वह भी बिल्कुल झरने की तरह शांत होने तक प्रतीक्षा करें तो वह भी निर्मल और स्वच्छ दिखाई पड़ता है। इसलिए बुरे समय में हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए।

भगवान बुद्ध का यह उपदेश सुनकर आनंद के आँखों में आँसू की धाराए बहने लग गई। उसे अब बिल्कुल समझ आ गया था कि उसने क्या गलती की है? उसने भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर अपने बुरे विचारों की मांफी माँगता है और कहता है कि भगवन मैंने घर त्याग कर बहुत बड़ी गलती की है। 

भगवान बुद्ध ने उसे घर की ओर लौटने का आदेश दिया और इस तरह आनंद अपने घर की तरफ लौट गया। 

Hindi Moral Stories For Class 1

नैतिक शिक्षा : – रोजमर्रा के जीवन में कुछ न कुछ हमारे मन में गलत विचारों का जन्म होना स्वभाविक बात है और ऐसा देखा भी जाता हैं। गलत विचारों पर ज्यादा सोच विचार नहीं करते है और बाद में पश्चाताप करते हैं। 

इस कहानी के माध्यम से हमें यही संदेश प्राप्त होता है कि— जिस प्रकार झरने में या नदियों में कितनी बार गंदगीयाँ प्रवाहित की जाती है लेकिन जब झरने का पानी शांत होता है। वह पुनः नव जीवन की भाँति निर्मल और स्वच्छ दिखाई पड़ता है। हमें भी मनुष्यता रूपी जीवन में अपने बुरे विचारों को सोच विचार कर शांतिपूर्वक बैठकर धीरजता के साथ उठाया हुआ कदम एक नई सफलता की ओर प्रोत्साहित करती है। 

प्रार्थना हो तो ऐसी

Moral Stories In Hindi For Class 1

सन् 1884 में, जब नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानंद) अपनी बी.ए की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, तब उनके परिवार पर एक भारी आफत आ गई। उनके पिताजी विश्वनाथजी की अचानक मृत्यु हो गई और पूरा परिवार अत्यंत शोक में डूब गया। पिताजी ने पूरी ज़िंदगी अपनी सामर्थ्य (शक्ति) से बाहर खर्च किया था। इसलिए मृत्यु के बाद सभी लेनदार उनके परिवार को बहुत परेशान करने लगे। 

बड़े होने के नाते अब पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी नरेन्द्रनाथ के सिर पर आ गई। परिवार के सात-आठ सदस्यों का निर्वाह करने के लिए वे नौकरी की खोज़ में भटकने लगे। लेकिन नौकरी मिलने के सभी प्रयत्न निष्फल गए। 

अपने परिवार को पर्याप्त खाना मिले इसलिए वे कई बार झूठ बोल देते कि उन्होंने किसी मित्र के यहाँ खाना खा लिया है और कई बार अपने भूखे भाई-बहन और माता को याद करके वे मित्रों से मिले खाने के निमंत्रण को भी अस्वीकार कर देते।

 नरेन्द्र के धनवान मित्रों को उनकी कठिन आर्थिक परिस्थिति का पता था फिर भी किसीने उनकी मदद नहीं की और वैसे भी उनका परिवार बहुत स्वाभिमानी था। इसलिए मदद के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने का तो उन्हें विचार भी नहीं आया।

 नौकरी की खोज़ में वे कई बार भूखे-प्यासे ही निकल पड़ते थे। उनके कई मित्रों ने उन्हें अप्रमाणिक ढंग से पैसे कमाने की प्रेरणा दी पर नरेन्द्रनाथ साफ मना कर देते थे। एक दिन, हर रोज़ की तरह नौकरी की खोज में निकलने से पहले नरेन्द्रनाथ भगवान का नाम ले रहे थे। यह सुनकर उनकी माँ बहुत ही कड़वाहट से बोली, “चुप हो जा, मूरख। बचपन से ही भगवान को भजता आया है। क्या किया इस भगवान ने तेरे लिए?” अतिशय गरीबी के कारण उनकी श्रद्धालु माता का विश्वास भी डिग गया था। 

इन शब्दों ने नरेन्द्र को बहुत चोट पहुंचाई। उन्होंने अपने आप से कहा, “काली माँ तो मेरे गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस की सभी प्रार्थनाएँ सुनतीं हैं। मेरे परिवार को इस गरीबी में से निकालने के लिए गुरुजी से प्रार्थना करने के लिए कहूँगा।” जब नरेन्द्र ने गुरुजी को काली माँ से प्रार्थना करने के लिए विनती ।  श्री रामकृष्ण ने उनसे कहा, “तुम खुद ही काली माँ से प्रार्थना करो। आज मंगलवार है। माँ की आराधना के लिए बहुत शुभ दिन है। आज शाम को उनके मंदिर जाकर, विनय से उन्हें दंडवत् प्रणाम करके जो भी प्रार्थना करोगे, वह ज़रूर फलेगी। काली माँ तो प्रेम और करुणा की मूर्ति हैं। 

अपने भक्तों की सच्चे दिल से की प्रार्थना वे ज़रूर स्वीकार करेंगी।” रात के नौ बजे नरेन्द्रनाथ काली माँ के मंदिर में गए। उन्हें माँ के दर्शन करने की आतुरता थी। हृदय में एक अलग ही भाव की तरंग बह रही थी। जब उनकी नज़र माँ की मूर्ति पर पड़ी, तब उन्हें साक्षात माँ के दर्शन हुए। साथ ही साथ ऐसा भी लगा जैसे उन्हें माँ से कोई विशेष आशीर्वाद मिलेगा या तो सुखी सांसारिक जीवन का या फिर आध्यात्मिक आनंद का।

नरेन्द्रनाथ ने सच्ची समझ, ज्ञान, त्याग और माँ के अविरत दर्शन के लिए प्रार्थना की, पर वे माँ से पैसे की माँग करना भूल गए।

प्रार्थना करने के बाद उन्हें बहुत अंतर शांति हुई। गुरुजी ने पूछा, तब उन्हें याद आया कि वे प्रार्थना में पैसे की माँग करना तो भूल ही गए। गुरुजी ने नरेन्द्र से फिर मंदिर जाकर, माँ से अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए प्रार्थना करने के लिए कहा। नरेन्द्र फिर से प्रार्थना में पैसे की माँग करना भूल गए। तीसरी बार भी ऐसा ही हुआ। गुरुजी के आनंद का पार नहीं रहा। उन्होंने नरेन्द्र से कहा, “मनुष्य जीवन का ध्येय संसारिक सुख या फिर खाना या कपड़े मिलना ही नहीं होना चाहिए। तुम्हारा ध्येय लोक कल्याण का होना चाहिए। श्रद्धा रखो। तुम्हारे परिवार का सादगी से गुज़ारा अवश्य होगा। थोड़े ही समय में नरेन्द्रनाथ को विद्यासागर स्कूल में एक अध्यापक की नौकरी मिल गई और सादगी से वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके।

देखा मित्रों, नरेन्द्र की प्रार्थना का उद्देश्य कितना ऊँचा था। किसी भी सांसारिक सुख लेने की उनकी इच्छा नहीं थी। सच्चे दिल की प्रार्थना ने उनके लिए संयोग मिलकर दिए। परिवार के निर्वाह के लिए थोड़े समय नौकरी की और फिर लोक कल्याण का भी बहुत बड़ा काम कर पाए।

जिददी राजू

Moral Stories In Hindi For Class 1

कहानी • भूपिंदर स.अरोड़ा

लालू गधा और लाली गधी अपने मालिक रामदीन के साथ खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. रामदीन एक मेहनतकश तथा ईमानदार मजदूर था. शहर में एक बड़ी इमारत बन रही थी. रामदीन रोज लालू और लाली पर ईंट, रेत आदि लाद कर वहां ले जाता था.शाम को रामदीन अपनी दिनभर की मजदूरी ले कर घर वापस लौटता था.

रामदीन लालू और लाली का बहुत खयाल रखता था. दिनभर मेहनत कर के लालू लाली थक जाते थे. अतः रामदीन उन्हें भरपेट चारा देता था. वह अपने जानवरों को केवल घासफूस खाने के लिए नहीं छोड़ देता था. अपने मालिक के प्यार को समझ कर बदले में लालू लाली भी जीतोड़ काम करते थे.

कुछ समय बाद लाली गधी ने एक बच्चे को जन्म दिया. रामदीन को बहुत खुशी हुई. लालू लाली भी बहुत प्रसन्न थे, उन्होंने उस का नाम राजू रख दिया.

छोटा राजू गधा धीरेधीरे बड़ा होने लगा. अब वह भी अपने मां बाप के साथ बाहर जाने लगा, लेकिन वह अभी बोझा नहीं ढोता था. लालू लाली जब अपनी पीठ पर बोझा ढोते थे, उस समय राजू नदी के किनारे घूमता रहता था. वहां धीरे धीरे राजू की अपनी ही उम्र के एक दूसरे गधे कालू से मित्रता हो गई. राजू और कालू अब रोज ही नदी किनारे मिलते और बहुत देर तक बातें करते रहते.

ये हम से कमरतोड़ काम लेते हैं, लेकिन उस के बदले में, हमें थोड़ी सी रूखीसूखी घासफूस देते हैं, बस वैसे भी यह बोझा ढोने का काम छोटा काम है. हमें कुछ और करना चाहिए. मेरी सलाह तो यही है कि तुम अपने माता पिता की तरह इस काम को कभी मत करना. कालू भैया, मैं ने तो पहले से ही सोच रखा है कि कुछ और काम करूंगा. मैं इस तरह दिन रात नहीं पिस सकता,राजू ने जवाब दिया। 

राजू अब बड़ा हो गया था. अतः रामदीन ने सोचा कि राजू से भी काम लिया जाए. एक दिन उस ने रेत की दो बोरियां राजू की पीठ पर लाद दीं. लेकिन यह क्या! राजू ने झटके से वे बोरियां नीचे गिरा दीं.

रामदीन मुस्करा दिया, उस ने सोचा कि राजू अभी बच्चा है. ‘शायद अभी यह काम नहीं कर पाएगा. लेकिन लालू लाली को इस बात से बहुत दुख हुआ. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि राजू अपने मालिक के साथ ऐसा व्यवहार करेगा.

कुछ तमीज सीखो, राजू!” लालू ने उसे डांटते हुए कहा. मैं यह काम नहीं करूंगा, मैं ने निश्चय किया है कि कोई दूसरा, इस से अच्छा काम करूंगा. “और आप दोनों को भी यह सब छोड़ देना चाहिए.”

इस पर राजू की मां लाली गधी को गुस्सा आ गया. “मूर्ख मत बनो. हमारे मालिक जैसा आदमी तुम्हें कहीं नहीं मिलेगा. वह हमें अच्छा खानेपहनने को देता है. हमारी अच्छी देखरेख करता है. “हम ने ऐसेऐसे मालिक देखे हैं, जो हम जैसे जानवरों से दिन-रत काम ले कर भी उन के साथ दुर्व्यवहार करते हैं.” मुझे तुम्हारी सलाह की कोई आवश्यकता नहीं, मम्मी. अब मैं बड़ा हो गया हूं. मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मुझे क्या करना है.

“अगर तुम दोनों मुझ से सहमत नहीं हो, तो मुझे अपना रास्ता खुद ढूंढ़ना होगा और मैं यहां से” राजू अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि उस का पिता, लालू गधा अपने गुस्से पर काबू नहीं रख सका और आंखें तरेरता हुआ राजू की ओर दौड़ा.

पिता को गुस्से में देख कर राजू भाग खड़ा हुआ. लेकिन लालू गधे ने उस के पीछे भाग कर एक जोर की लात जमाई और गुस्से में बोला, “बेवकूफ, चल भाग यहां से! देखता हूं तू क्या करता है! “जब कुछ दिन बाहर की ठोकरें खाएगा, तो अपने‌ आप अकल ठिकाने आ जाएगी और तब तू लौट कर इसी मालिक के पास आएगा,” यह कह कर लालू दुखी मन से लौट आया.

वहां से राजू सीधा कालू के पास गया. फिर वे दोनों उस जगह को छोड़ कर पास के एक दूसरे गांव में चले गए. दूसरे गांव में बहुत से कुत्ते भौंकते हुए उन के पीछे पड़ गए. दोनों ने भाग कर किसी तरह उन से छुटकारा पाया.

कुछ देर बाद दोनों को तेज भूख लगी. दोनों पास ही के मैदान में उगी हुई हरी-भरी घास खाने लगे.

वह जमीन एक किसान की थी. जब किसान ने देखा कि दो गधे उस की जमीन पर घास चर रहे हैं तो उस ने झट से अपने नौकरों को ले कर उन्हें पकड़ लिया. दरअसल, किसान को गधों की जरूरत थी. फसल कट चुकी थी.किसान हर रोज कालू और राजू की पीठ पर गेहूं लाद कर पास की मंडी में बेचने ले जाता. इस तरह कालू और राजू को दिन में कई बार गेहूं की भारी भारी बोरियां लाद कर शहर जाना पड़ता था. शाम को जब वे लौटते थे तो बुरी तरह थक चुके होते थे. और उस पर, किसान उन को आधा पट खाना देता था.

अक्सर उन्हें भूखा ही सोना पड़ता था. जब भी वे दोनों काम करने में थोड़ी सी आनाकानी करते, किसान उन को बुरी एक दिन उन्होंने भागने की कोशिश की, लेकिन किसान के नौकरों को पता चल गया. उन्होंने दोनों की डंडे से खूब पिटाई की। राजू और कालू दर्द से कराह उठे. उन की चीख निकल गईं.

एक दिन राजू और कालू को दूसरे गधों के साथ, पीठ पर बोझा ले कर किसी दूसरे गांव जाना था. रास्ते में उन का अपना गांव पड़ता था. जब वे दोनों उस गांव में आए, तो उन्होंने अपना पुराना गांव एकदम पहचान लिया. दोनों बहुत खुश हुए. चलते-चलते जब वे रामदीन के घर के पास पहुंचे तो दोनों ने एक साथ जोर-जर से रेंकना शुरू कर दिया.

लालू और लाली उस समय घर में ही थे. दोनों ने अपने बेटे राजू की आवाज पहचान ली. वे दोनों भी जोरजोर से रेंकने लगे. शोर सुन कर रामदीन बाहर निकल आया. लालू लाली को बेचैन देख कर, रामदीन ने दोनों को खोल दिया. लालू लाली तुरंत गधों के झुंड की तरफ दौड़ पड़े, जो कि रामदीन के घर के सामने से जा रहा था.

राजू ने अपने मातापिता को आते देखा, तो जोर-जर से रेंकते हुए बोला, “पापा बचाओ, मुझे बचाओ, मम्मी” अपने बेटे की ऐसी हालत देख कर लालू लाली के आंसू राजू बहुत ही कमजोर हो गया था. जब किसान के नौकरों ने कालू और राजू को अपने साथ हांकना चाहा, तो वे दोनों अड़ गए. उन को अड़ा देख कर वे उन को पीटने लगे.

इस पर लालू लाली उन नौकरों पर झपट पड़े और दोनों ने उन पर दुलत्तियां चलानी शुरू कर दीं. नौकर घबरा गए. वे जान बचा कर भागे. कालू और राजू सिर झुकाए शर्मिंदा से खड़े थे. उस दिन से राजू ने निश्चय कर लिया कि अपने मां-बाप की आज्ञा का पालन करूंगा और उन के साथ रह कर मालिक रामदीन की सेवा करूंगा.

अंत भला तो सब भला

Hindi Short Stories For Class 1

लेखिका – कु.रोशनी मरकाम

रामगढ़ राज्य के राजा रामेश्वर की दो पत्नियां थी, कौशल्या और सुभद्रा. सुभद्रा स्वभाव से सुशील और गुणी थी जबकि कौशल्या कपटी व चालबाज औरत थी. सुभद्रा के दो बच्चे थे. एक पुत्र शिखर और दूसरा पुत्री सुधा. कौशल्या को एक भी बच्चा नहीं था. इस कारण उसे अपनी सौतन से जलन होती थी. 

उसने राजा के कान भरे कि सुभद्रा के बच्चे उनके नहीं बल्कि किसी और के हैं. राजा कौशल्या की बातों में आ गया और उसने सुभद्रा को महल से निकाल दिया. सुभद्रा अपने बच्चों को लेकर मायके गई परंतु उसकी मां ने भी उसे अपने घर में पनाह नहीं दी. उसकी मां ने कहा – जो अपने पति की नहीं हुई वह किसी की नहीं, और उसने दरवाजा बंद कर लिया. सुभद्रा अपने बच्चों को लेकर जंगल की ओर चल दी और वही एक झोपड़ी बनाकर रहने लगी.

कुछ वर्ष बीत गए. एक दिन सुभद्रा के दोनों बच्चों ने उससे अपने पिता के बारे में पूछा. सुभद्रा कुछ नहीं बोली और रोने लगी. उसके बच्चों ने अपनी मां को रोते देख फिर कभी यह प्रश्न नहीं करने का वादा किया. इधर महल में कौशल्या को एक भी बच्चा नहीं हुआ. उसका व्यवहार राजा की प्रति भी अच्छा नहीं था. 

राजा ने जब पता लगाया तो उसे मालूम हुआ कि सुभद्रा के बच्चे राजा के ही हैं और कौशल्या ने झूठ बोला था. यह जानकर राजा ने कौशल्या को महल से निकाल दिया और सुभद्रा की तलाश करने लगे. तलाश करते करते राजा को जंगल में वह झोपड़ी मिल गई, जहां पर सुभद्रा अपने बच्चों के साथ रहती थी. राजा ने सुभद्रा से क्षमा मांगी और उसे तथा बच्चों को महल ले आया. सब खुशी-खुशी रहने लगे. इसीलिए कहते हैं अंत भला तो सब भला.

मेरे टीचर

Short Moral Stories In Hindi For Class 1 

प्राथमिक विद्यालय सुंदर नगर की कक्षा पांच के विद्यार्थियों को प्रधानाध्यापक हाथीराम इतिहास का पाठ पढ़ा रहे थे। सभी विद्यार्थी ध्यान लगाकर सुन रहे थे, लेकिन सामू बंदर पीछे की पंक्ति में बैठा खरट ले रहा था। 

हाथीराम जी के कानों में उसके खर्राटों की आवाज पड़ी, तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उन्होंने सामू को क्लास से बाहर निकाल दिया। सभी बच्चे उसकी खिल्ली उड़ाने लगे। सामू के पिता सुंदर नगर में बहुत प्रसिद्ध थे। उन्होंने शिक्षा मंत्री को फोन लगाकर हाथीराम जी का ट्रांसफर करने की मांग की। 

शिक्षा मंत्री ने हाथीराम जी का ट्रांसफर सुंदर नगर से सुनसान नगर में करा दिया। हाथीराम जी ने आदेश मिलते ही सुनसान नागर के प्राथमिक विद्यालय में पहुंचकर अपना काम शुरू कर दिया। हाथीराम जी ने विद्यालय की शिक्षा के स्तर में खूब सुधार करके विद्यार्थियों के दिलों में राष्ट्र-प्रेम और समाज सेवा की भावना भर दी। विद्यार्थी व सुनसान नगर के निवासी हाथीराम जी के संपर्क में आकर शिक्षित हो गए। 

शिक्षा के प्रभाव से वहां के जानवर आसपास के नगरों से व्यापार करके धनवान बन गए। हाथीराम जी ने सुनसान नगर के धनवान व समाजसेवी लोगों से मिलकर चंदा इकट्ठा किया। फिर उस चंदे से वहां के विद्यालय भवन का पक्का निर्माण करा दिया। 

वहां के निवासियों ने भवन उद्घाटन के लिए जिला शिक्षा अधिकारी को मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होने का निमन्त्रण दे दिया। निश्चित दिन मुख्य अतिथि के रूप में जिला शिक्षा अधिकारी आ गए। कार से उतरकर उन्होंने समारोह के अध्यक्ष हाथीराम जी के पैर छुए। भवन के उद्घाटन का फीता काटकर जिला शिक्षा अधिकारी भाषण देते हुए बोले-“प्यारे बच्चो, आप सभी भाग्यशाली है कि सुनसान नगर में सबने मिलकर विद्यालय भवन का निर्माण करवाया। मेरे खयाल से आप सभी को प्रेरणा देने वाले मेरे पूजनीय गुरुदेव हाथारीम जी ही होने चाहिए। 

आज से पचीस साल पहले मैं भी इनका शरारती व बदमाश विद्यार्थी था। पढ़ाई के समय में कक्षा सो रहा था। तब इन्होंने मुझे क्लास से बाहर निकाल दिया था और बदले की नीयत से मेरे पिता जी ने इनका ट्रांसफर आपके सुनसान नगर में करा दिया था। उस समय मैं बहुत खुश हुआ, परंतु मेरे कारण सुंदर नगर के प्राथमिक विद्यालय की पढ़ाई चौपट हो गई। ऐसी हालत में हम सपरिवार सुंदर नागर छोड़कर आजाद नगर में जाकर रहने लगे। मुझे गुरु जी द्वारा दी गई सजा हमेशा याद आती थी।

अपनी गलती का प्रायश्चित करने के लिए मैने कमर कसकर पढ़ाई की। लगन, निष्ठा व मेहनत से पढ़ते-पड़ते में जिला शिक्षा अधिकारी बन गया। आज आप सभी के समक्ष में गुरुदेव से क्षमा मांगता हूं।” अब हाथीराम जी को याद आया कि जिला शिक्षा अधिकारी और कोई नहीं, वर्षों पूर्व उनका शिष्य रहा सामू बंदर है। उन्होंने सामू को गले लगाकर आशीर्वाद दिया।

सबक

Hindi Story For Class 1

कहानी संगीता जीत

काननवन में चिन्नी चिड़िया ने चूंचूं चिड़े के साथ आम के पेड़ पर अपना घोंसला बनाया. वे हंसी-खुशी अपने दिन व्यतीत करने लगे. कुछ महीनों बाद चिन्नी ने अंडे दिए. दोनों काफी खुश थे. अंडों की देखभाल के लिए दोनों में से एक हमेशा घोंसले में रहता ताकि दूसरा बाहर जा कर भोजन की व्यवस्था कर सके. जिन दिनों अंडों में से बच्चे बाहर निकलने वाले थे, दोनों घोंसले में ही रहते थे. 

एक दिन वहां बड़कू हाथी आया. वह थका हुआ था, इसलिए सो गया. थोड़ी देर विश्राम करने के बाद वह उठा और भूख मिटाने के लिए सूंड से आम की पत्तियां और टहनियां तोड़तोड़ कर खाने लगा. उस की इस हरकत से पूरा पेड़ हिल रहा था. अब चिन्नी एवं चूंचूं को अंडों की फिक्र हई. आखिरकार चिन्नी से न रहा गया. वहनीचे गई और बड़कू से विनती कर के कहने लगी, ‘हाथी दादा, आप कृपया ऐसा न करें, हमारे अंडे गिर जाएंगे. परंतु बड़कू पर चिन्नी की प्रार्थना का कोई असर नहीं हुआ.

वह और जोर से पेड़ हिलाने लगा. अंत में चिन्नी का घोंसला अंडों सहित नीचे आ गिरा. बड़कू अंडों को अपने पैरों तले रौंदता हुआ जंगल की ओर चला गया.

चूंचं व चिन्नी रोने लगे. काफी देर तक रोने के पश्चात् चिन्नी ने बड़कू को सबक सिखाने की ठानी. वह और चूंचूं दोनो अपने मित्र किटू कठफोड़वा के पास गए और सारी बात बताई. तब किटू ने उन्हें भरपूर मदद देने का वादा किया. साथ ही उन्हें अपने घोंसले में रख लिया. भोजन खिलाया तथा फल खाने को दिए.

चिन्नी ने किटू से कहा, “मैं ने एक योजना बनाई है, जिससे हम उस दुष्ट हाथी को सबक सिखा सकते हैं. इस के लिए चींटी रानी तथा मेघू मेढक की सहायता की आवश्यकता होगी.”

किटू ने जा कर चींटी रानी तथा मेघू को अपने घर बुलाया. सभी बैठ कर योजना पर विचार करने लगे. अगले दिन चूं ने बड़कू को केले के एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा. वह केले खाने में मस्त था. चूंचूं अपने सभी साथियों को बुला लाया. थोड़ी देर बाद बड़कू हाथी वहीं पर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा. 

अब चींटी रानी अपनी फौज के साथ आई. चींटियों ने बड़कू की सूंड और आंखों पर हमला बोल दिया. चींटियों के काटने से बड़कू परेशान हो उठा, तभी किटू कठफोड़वा ने अपने साथियों के साथ बड़कू के पेट एवं कानों पर काटना शुरू किया.

बड़क दर्द से बेहाल था. वह आंख भी नहीं खोल पा रहा था. उसे पानी की सख्त आवश्यकता थी.तभी उसे मेढकों के टनेि की आवाज सुनाई दी. उस ने सोचा, आसपास कहीं तालाब होगा. वह उसी दिशा की ओर चल पड़ा. आगे बढ़ते बढ़ते वह एक बड़े गड्ढे में गिर पड़ा. दरअसल मेघू व उस के साथी शिकारियों द्वारा खोदे गड्डे के पास टर्रा रहे थे.

काफी देर बाद जब बड़कू का दर्द कम हुआ तो उस ने देखा कि चिन्नी चूंचूं, किटू और मेघू गड्ढे के बाहर बैठे हैं. तब उन्होंने बड़कू को बताया कि दूसरों को सताने का क्या नतीजा निकलता है. जब स्वयं को परेशानी होती है, तब कैसा लगता है. बड़कू ने अपने किए पर शर्मिंदा हो कर माफी मांगी. उस के माफी मांगने तथा आगे से ऐसी गलती दोबारा न करने का आश्वासन पा कर किटू बड़कू के साथियों को बुला लाया. तब उन्होंने रस्सों एवं बल्लियों की सहायता से बड़कू को बाहर निकाला.

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