Chhoti Si Hamari Nadi Poem Class 5 Hindi Chapter 17 | छोटी सी हमारी नदी

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Ncert Book Chhoti Si Hamari Nadi Poem ( छोटी सी हमारी नदी )

इस छोटी सी हमारी नदी कविता का लेखक महान कवि रविंद्रनाथ टैगोर जी है। जो भारत के प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। इन्होंने कविता के साथ-साथ उपन्यास और रचनाएँ भी लिखी हुई है। 

इनकी कुछ प्रसिद्ध उपन्यास है नौकाटूबी, गौरा, चतुरंगा, आदि है और उनका प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार है जैसे कि गीतांजली, गीताली, शिशु , भोलेनाथ आदि है।

महान कवि रविन्द्रनाथ टैगोर को 1913 में नोबल पुरस्कार द्वारा सम्मानित भी किया गया है। 

इन्होंने एक बहुत ही सुंदर कविता लिखी हुई है जिसका नाम – छोटी सी हमारी नदी 

कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस कविता का सुंदर चित्रण करते हुए कहा है कि गाँव में एक छोटी सी नदी होती है जो बिना भेदभाव किए बिना ही निरन्तर बहती रहती है। हमें भी उस छोटी नदी के समान भेदभाव किए बिना ही आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। 

आइए इस छोटी सी कविता को पढ़ कर उसके भावार्थ को समझ सकें। यह कविता अच्छी लगे तो अपने मित्र के साथ Share ( शेयर ) अवश्य करें।

 

छोटी सी हमारी नदी

Chhoti Si Hamari Nadi Poem

 

छोटी-सी हमारी नदी टेढ़ी मेढ़ी धार,

गर्मियों में घुटने भर भिगों कर जाते पार |

पार जाते ढोर-डंगर , बैलगाड़ी चालू ,

ऊँचे हैं किनारे इसके, पाट इसका ढालू |

 

पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, 

काँस फूले एक पार ऊजले जैसे धाम |

दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार,

रातों को हुआँ-हुआँ कर उठते सियार |

 

अमराई दूजे किनारे और ताड़-वन, 

छाँहों-छाँहों बाम्हन टोला बसा है सघन |

कच्चे-बच्चे धार-कछारों पर उछल नहा लें, 

गमछों-गमछों पानी भर-भर अंग-अंग पर ढालें |

 

कभी-कभी वे साँझ-सकारे निबटा कर नहाना, 

छोटी-छोटी मछली मारें आँचल का कर छाना |

बहुएँ लोटे-थाल माँजती रगड़-रगड़ कर रेती, 

कपड़े धोतीं, घर के कामों के लिए चल देती |

 

जैसे ही आषाढ़ बरसता, भर नदिया उतराती,

मतवाली-सी छूटी चलती तेज धार दन्नाति |

वेग और कलकल के मारे उठता है कोलाहल, 

गँदले जल में घिरनी-भँवरी भँवराती है चंचल |

दोनों पारों के वन-वन में मच जाता है रोला, 

वर्षां के उत्सव में सारा जग उठता है टोला | 

 –रवींद्रनाथ टेगौर

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Chhoti Si Hamari Nadi Poem ( छोटी सी हमारी नदी कविता का शब्दार्थं )

 

ढोर-डंगर – जानवर

पाट – बीच का भाग

ढालू – ढलान, ढालदार

पेटे – तला (पेट में)

झकाझक – एक दम बढ़िया

बालू – रेत

काँस – एक प्रकार की लंबी घास,

जिसके सफ़ेद फूल खिलते हैं

पार – किनारे

उजले – सफ़ेद

घाम – धूप

किचपिच – मैना की आवाज

डार – डाल

अमराई – आम का बाग

ताड़-वन – ताड़ वृक्षों का जंगल

छाँहों – छाँव, छाया

बाम्हन – ब्राह्मण

टोला – समूह, झुंड

सघन – घना

कछारों – किनारा

गमछा – तौलिया

साँझ-सकारे – शाम सवेरे

आँचल – पल्ला, धोती

छाना – छलनी के रूप में इस्तेमाल

बहुएँ – घर की बहू, स्त्रियाँ

आषाढ़ – बरसात का महीना

दन्नाती – तेजी से

वेग- तेज़ गति

कलकल – नदी के प्रवाह की ध्वनि

कोलाहल – शोर

गंदले – गंदा, मटमैला

घिरनी – भंवरी- गोल भँवर

चंचल – जो बराबर गतिशील हो

पारों – किनारों

वन-वन – जंगलों

रोला – शोर

उत्सव – त्योहार

जग – संसार

टोला – टोली, झुंड

Choti Si Hamari Nadi poem of summary (छोटी सी हमारी नदी कविता का सारांश)

इस कविता के कवि रवींद्रनाथ ठाकुर हमारा ध्यान उस छोटी-सी नदी की तरफ आकर्षित करना चाहते हैं जिसकी धार टेढ़ी-मेढ़ी है। गर्मियों में घुटने तक पानी होने के कारण इसे पशु और बैलगाड़ी भी आसानी से पार कर जाते हैं। नदी के किनारे ऊँचे व पाट ढलावदार हैं और तले में बढ़िया बालू रेत है, कीचड़ बिलकुल भी नहीं। किनारे पर काँस के सफ़ेद फूल खिले हैं। दिन भर मैना बोलती हैं और रात में सियारों की आवाजें सुनाई पड़ती हैं।

एक किनारे पर आम का बगीचा और दूसरी तरफ ताड़ के वृक्ष हैं जिनकी छाँवों में ब्राह्मणों का घना मोहल्ला बसा है। छोटे बच्चे नदी के किनारे उछल-उछल कर नहाते तो कभी अपने तौलिए में पानी भर कर अपने शरीर पर डालते तो कभी अपना काम निपटा कर मछली भी मारते हैं। उनके घर की स्त्रियाँ, नदी तट पर, बालू रेत से बर्तन माँजती, कपड़े धोती हैं और फिर घर के काम के लिए चली जाती हैं।

जैसे ही बारिश का महीना (आषाढ़) आता है, बारिश के बाद नदी में पानी का स्तर बढ़ जाता है। नदी की धार बहुत तेज़ हो जाती है जिससे नदी का पानी गंदा हो जाता है और पानी में भँवर जैसा आ जाता है। पानी के कलकल की ध्वनि चारों तरफ शोर मचा देती है तथा सारा संसार जाग उठता है अपने-अपने समूह में उत्सव मनाने लिए।

 

Chhoti Si Hamari Nadi Poem ( छोटी सी हमारी नदी कविता का संपूर्ण व्याख्या )

महान कवि रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित यह कविता एक छोटी सी नदी पर आधारित हैं। इस कविता में कवि नदी में होने वाले हर प्रकार के गतिविधियों का सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा है कि जिस तरह नदी बिना किसी भेदभाव के सभी को अपना समान स्थान प्रदान करती हैं ठीक उसी तरह हमें भी नदी के समान परोपकारी और गुणवान होना चाहिए।

कवि इस कविता के माध्यम से यही कहना चाहते है कि जिस तरह गाँव में एक छोटी सी नदी होती है। इस नदी की बहने की दिशा हमेशा टेढ़ी मेढ़ी होती हैं। जब गर्मी का समय आता है तो नदी का पानी का स्तर बहुत ही कम हो जाता है। जिसके कारण से नदी में पानी पैर के घुटने के बराबर दिखाई पड़ता हैं। जब नदी में पानी पैर के घुटने के बराबर हो जाता हैं। 

जंगल के सभी जानवर , इंसान और बैलगाड़ी जैसे वाहन आसानी से आर पार हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकार का डुबने का डर भी नहीं लगा रहता है। वे आसानी से इस पार से उस पार चले जाते हैं।

कवि का मानना है कि कही-कही नदीयों का किनारा ऊँचा दिखाई देता हैं और उसका पाट ढालू होता है अर्थात् उस नदी का आकृति देखने में ढलवाँ जैसी लगती हैं। 

नदी में पानी का स्तर कम हो जाने के कारण उसकी गहराई में न ही बालू रहता है और न ही कीचड़ होता है।

कवि ने कहा है कि काँस का एक फूल है जो सूर्य के धूप के सामान सफेद दिखाई पड़ता है वह भी बिल्कुल सूर्य के धूप के सामान खिलते हुए दिखाई पड़ रहा है। 

इस सुंदर दृश्य को देख कर मैना दिन-भर अपने आवाज में किचपिच किचपिच करती रहती हैं। वह कभी एक डाल पर बैठती और कभी दूसरे डाल पर इस तरह से पक्षीयों का शोरगुल हमेशा उस नदी के किनारे सुनाई पड़ता है। 

वही उस नदी के किनारे जब रात्री के समय होता, सियार जोर-जोर से अपनी आवाज में हुआँ हुआँ करता रहता है।

 

जो नदी का दूसरा किनारा है। उस जगह पर बड़े-बड़े आम और ताड़ का पेड़ लगा हुआ है। जिस जगह पर आम और ताड़ का सुंदर पेड़ लगा हुआ है उसके पेड़ की छाया के नीचे एक ब्राम्हण का टोला बहुत ही घने आबादी में बसा हुआ है। 

उस ब्राम्हणी नगरी में बसे हुए छोटे-छोटे बच्चे नदी में हमेशा खेलते रहते हैं। वे नदी की निरंतर बहती धारा में उछल-उछल कर स्नान करते रहते हैं। जब बच्चे स्नान करने के बाद एक गमछी की कपड़े की सहारे वे उसमें पानी भरते है और मस्ती में मग्न होकर एक दूसरे के शरीर पर पानी डालकर खेलते है। 

कभी कभी छोटे बच्चे शाम होने से पहले ही अपना काम नदी में समाप्त कर लेते है और बचे हुए समय में बच्चे नदी में छोटी छोटी मछलियाँ पकड़ते रहते हैं। 

गाँव की सभी स्त्रीयाँ नदी से निकाले हुए बालू को प्रतिदिन बर्तन को रगड़ रगड़ कर खूब माँजती है और वह अपने सभी कपड़े को भी साफ कर कर धोती है।  जब वह अपने सभी कामों को समाप्त करती है वह तुरंत अपने घर के दूसरे कार्यों को करने के लिए वहाँ से चली जाती है। 

कवि कहते है कि जैसे ही नदी में बरसात का समय आता है। नदियों में पानी ज्यादा भर जाने के कारण नदियाँ का पानी उफान पर आ जाता हैं और चारों तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगता है। अब उसकी बहने वाली धारा में पहले की अपेक्षा बहुत ही तेजी से दिखाई देने लगता है। 

नदी में पानी भर जाने से अब उसकी आवाज भी पहले की तरह जोरों से सुनाई पड़ती हैं और उसकी बहती हुई कलकल की आवाज भी कानों में मधुर संगीत की तरह सुनाई पड़ता है। 

जब बर्षा का तेज धारा नदियों में जाता है। उस नदी का पानी गँदला रंग ( मिट्टी की रंग ) के जैसा दिखाई पड़ता है और पानी की गति इतना तेज होता है कि उस नदी की पानी का घुमाव बिल्कुल घिरनी की तरह गोल गोल दिखाई देता है।

नदी के दोनों किनारे पर वन ही वन लगे हुए हैं। जब वर्षा का पानी नदियों में जाता है। उस नदी की धारा पहले की अपेक्षा बहुत ही तेज हो जाती है जैसे ही वह पेड़-पौधे से टकराता है। उस पर जोरों का कलकल की आवाज सुनाई पड़ता है।

वर्षा के महीने में नदी के किनारे ऐसा प्रतित होता है। मानों कि नदी के किनारे पर कोई उत्सव मनाया जा रहा हो और उस उत्सव में सारा संसार जाग कर हर्षोल्लास के साथ खुशिया मनाता हो। 

इस कविता ” छोटी सी हमारी नदी “ में कवि रविन्द्र नाथ टैगोर बहुत ही सुंदर चित्रण प्रस्तुत किए हुए हैं और वे कहते हैं कि जिस तरह नदीयाँ देखने में बिल्कुल छोटी सी दिखाई पड़ती हैं। लेकिन वे हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण योगदान देती है। वे हमारे सुख-दुःख के साथी की तरह अपना निरंतर कार्य करती रहती है। 

जिस तरह से नदीयाँ मनुष्य के लिए किसी न किसी प्रकार का हमें हमेशा मदद ही करती रहती है। हमें भी बहती हुई नदी के समान उसके परोपकारी गुणों को सिखकर मानव रूपी जीवन में उतार सकें। 

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