19+ मजदूर दिवस पर सुंदर कविता | Poem On Labour Day In Hindi

Poem On Labour Day In Hindi :- आज के पोस्ट में मजदूर दिवस /श्रमिक दिवस पर बहुत ही सुंदर और बेहतरीन कविता प्रस्तुत किया गया है।

 

मैं मजदूर हूँ 

Poem On Labour Day In Hindi

 

मैं मजदूर हूँ,

जी हां मैं मजदूर हूँ।

इन चमचमाती सड़कों से लेकर,

उन गगनचुंबी इमारतों का निर्माण,

मैंने ही अपने हाथों से किया है। 

 

आदिम युग से लेकर आज तक,

विकास को दिशा मैंने ही दिया है,

फिर भी अपने हक से,

आज भी कोसों दूर हूँ,

क्योंकि मैं मजदूर हूँ।।

 

मैंने उन तथाकथित, 

उच्च लोग के लिए,

क्या से क्या नहीं किया।

उन्हें अमृत देकर स्वयं,

उपेक्षा का जहर पिया,

अपनी कर्मशीलता के लिए,

मैं आज भी मशहूर हूँ,

क्योंकि मैं मजदूर हूँ।।

 

उनके हिस्से में सुख है, 

मेरे हिस्से में दुःख है।

उनके हिस्से में छांव है,

मेरे हिस्से में धूप है।

मैं इतना क्यूँ मजबूर हूँ,

सिर्फ इसीलिए,

क्योंकि मैं मजदूर हूँ।।

 

कोई क्यूँ यह नहीं समझता, 

कि मेरे भी ख्वाब है,

मेरे भी कुछ अरमान है,

दुःख और अभाव से ग्रस्त,

मेरे मासूम बच्चों का भी,

अपना कोई जहान है।

फिर दुनियाँ की हर खुशियों से,

मैं ही क्यों मरहूम हूँ,

सिर्फ इसीलिए,

क्योंकि मैं मजदूर हूँ।।

-श्रवण कुमार साहू

 

श्रमिक

Poem On Labours Day

 

एक मई श्रमिक दिवस को, 

श्रम दिवस स्वरूप है मनाया जाता।

आठ घण्टे काम करते हैं जो,

श्रमिक उन्हें है कहा जाता।

 

श्रम दिवस को, 

श्रमिकों के काम से छुट्टी रुप में है जाना जाता।

समाज-देश को नव निर्माण का,

श्रमिकों के श्रम को श्रेय है जाता।

 

बड़े-बड़े भवनों की भव्यता, 

पर हर कोई मोहित हो जाता।

ना है समय किसी के पास,

जो श्रमिकों के दर्द को है पूछ जाता।

 

इस दिवस पर, 

श्रमिकों के श्रम का है सम्मान किया जाता।

मई दिवस है इन्हें समर्पित,

जिसके दम पर नव निर्माण है किया जाता।

-सीमांचल त्रिपाठी

 

देश सेवा करने चले मजदूर 

Poem On Labour Day In Hindi

 

देश सेवा करने को चल पड़े हैं मजदूर, 

दो वक्त रोटी के खातिर हो जाते हैं घर से दूर।

 

हाथ में थैला, कांधे में है भरा सामान, 

परिवार संग साथ लेकर चल पड़े अरमान।

 

जहाँ मिले काम और मजदूरी वहीं देते हैं तंबू तान, 

लग जाते है सब सेवा में क्या बच्चे और क्या सियान।

 

सुबह होते ही रहता है मन में एक ही ध्यान, 

रूखी-सुखी रोटी खाकर करते हैं वे अपना काम।

 

साहेब लोगों का हमेशा चुप कर सुनते है डांट, 

सब कुछ परिवार संग लेते हैं वे बांट।

 

फावड़ा, बेलचा धर करते नित दिन काम, 

सूर्योदय से सूर्यास्त तक कभी न करते ये आराम।

 

खाना बनाने को न चूल्हा है न बर्तन, 

इनको चिंता सताए कैसे करें परिवार का जतन।

 

कभी न थकते इनके चाहे पैरों में पड़ जाए छाले, 

कमाकर रोटी खाते फिर भी पड़ते है इनको लाले।

 

सुन चिड़ियों की करलव अब हो गई नई बिहान, 

सब मिलकर काम करेंगे तभी बनेगा देश महान।।

-कृष्ण कुमार ध्रुव

मै मजदूर हूँ

Labour Day Poetry

पर्वत को काट मैंने सड़क बनाई,

उन सड़कों पर लोगों ने वाहन अपनी दौड़ाई,

उसी सड़क में पैदल चलने को मजबूर हूँ,

सुविधाओं से दूर मैं मज़दूर हूँ.

न दिन को चैन, न रात को आराम,

जब तक है जान,

निष्ठा से करूँ काम,

फिर भी मालिक के आगे,

सिर झुकाने को मजबूर हूँ,

सुविधाओं से दूर मैं मजदूर हूं.

सूत कात कर वस्त्र बनाता,

वस्त्रों से सबके तन को सजाता,

फिर भी फटे पुराने वस्त्र पहनने को मजबूर हूँ

सुविधाओं से दूर मैं मजदूर हूँ.

फलों के मैंने सुन्दर बाग लगाए,

बाग के सारे फल मालिक खाए,

मैं तो सिर्फ रखवाली करने को मजबूर हूॅं

सुविधाओं से दूर मैं मजदूर हूँ।

दैनिक मजदूरी से जीवन चलाते

श्रम से खून-पसीना खूब बहाते

फिर भी अल्प मजदूरी पाने को मजबूर हूँ,

सुविधाओं से दूर मैं मजदूर हूँ।

लोगों के लिए मनचाहा घर बनाता,

घर में सुविधाओं का ध्यान रखा जाता,

फिर भी फुटपाथ पर रहने को मजबूर हूँ,

सुविधाओं से दूर मैं मजदूर हूँ।

दुनिया को रोशन करता

खुद रोशनी से दूर हूँ

आज भी अंधेरे में रहने को मजबूर हूँ,

सुविधाओं से दूर मैं मजदूर हूँ।

कारखाने में मशीनों को चलाता,

दिन दूनी रात चौगुनी आय बढ़ाता,

फिर भी अभाव में जीने को मजबूर हूँ,

सुविधाओं से दूर हूँ। हाँ,मैं मजदूर हूँ।

मनोज पाटनवार

हाँ मैं मजदूर हूँ

Labour Day Poetry

काम कुछ भी रहे,

काम में बस रहता चूर हूँ…

परिवार के लिए ही,

परिवार से रहता दूर हूँ..

हाँ मैं मजदूर हूँ..

अपने मालिक के लिए,

जीतोड़ मेहनत करता जरूर हूँ..

नहीं देता कोई साथ,

फिर भी अपने लिए भरपूर हूँ..

हाँ मैं मजदूर हूँ..

ईष्या द्वेष नही किसी से,

अपने किये पर करता गुरुर हूँ..

मतलब नहीं किसी से,

अपने आप मे रहता मगरूर हूँ..

हाँ मैं मजदूर हूँ..

सन्तोष कुमार तारक

मजदूर

Poem On Labour Day In Hindi

माथे पर पसीना,

चमके जैसे नगीना.

करती श्रम अपार,

रहे कोई भी महीना..

तन ढकने ठीक,

से हैं कपड़े नहीं.

साज और श्रृंगार,

वह जानती नहीं..

बाँध बच्चा पीठ पे,

करती वह मजदूरी.

प्रतिदिन करना काम,

है उसकी मजबूरी..

दिन-दिन धूप मे करे,

वर्षा गर्मी से ना डरे.

अथक मेहनत वो करे,

हंसी-खुशी से है परे..

खुद भूखी रहकर वह,

बच्चों को है खिलाती.

खुद गीले में भी रहकर,

सुखे में है उन्हें सुलाती..

सीमांचल त्रिपाठी

मजदूर

Poem On Labour Day In Hindi

मजदूरी का काम है, करते प्रतिदिन काम,

बहे पसीना माथ से, मिले नहीं आराम..

मिले नहीं आराम, हाथ छाले पड़ जाते.

सर्दी हो या ठंड, मेंहनत कर के खाते..

परिवारों को देख, रहे सबकी मजबूरी.

कैसी हो हालात, करे फिर भी मजदूरी..

कहते हैं मजदूर को, जग के हैं भगवान,

कर्म करें वो रात दिन, बने नेक इंसान..

बने नेक इंसान, सभी के महल बनाते.

करते श्रम हर रोज, तभी तो रोटी खाते..

धूप रहे या छाँव, बोझ सबके है सहते.

सुख दुख रहते साथ, कभी कुछ भी ना कहते..

छाले पड़ते हाथ में, काँटे चुभते पाँव,

सहते कितनी मुश्किलें, बैठे कभी न छाँव..

बैठे कभी न छाँव, ठोकरे दर दर खाते.

रहती है मजबूर, नहीं दिखती हालाते..

आँसू उनके देख, जुबाँ लग जाते ताले.

चलते नंगे पाँव, हाथ पड़ जाते छाले..

प्रिया देवांगन 

मजदूर और मेहनत

Poem On Labour Day In Hindi

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ,

अपने मेहनत के दम पर अपना पेट भरता हूँ,

लोग भले ही समझते हैं मुझे दीन-हीन,

मैं ही तो मेहनत से उनकी किस्मत बदलता हूँ..

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ…..

सूरज के जागने से पहले, जाग जाता हूँ,

सूरज के सो जाने के बाद, घर लौटता हूँ.

मैं गारे बनाता हूँ, ईंटें चुनता हूँ,

हाँ मैं वही मजदूर हूँ,

जो तुम्हारे सपनों का महल बुनता हूँ.

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ…..

खुद बड़ी-बड़ी इमारतें बनाता हूँ लेकिन मैं,

गंदी बस्ती की झोपड़पट्टी में रहता हूँ.

नहीं मेरे पास मुलायम मखमली बिस्तर,

पत्थर पर सिर रखकर जमीन में सो जाता हूँ.

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ…..

कई दफा मैं रेल की पटरियों से कट जाता हूँ,

कोयले की चाप से, खदानों में भी दब जाता हूँ,

मेरी आवाज कोई नहीं सुनता,

फिर भी मैं कारखानों में काम करता हूँ.

भूखा हूँ, दो वक्त की रोटी कमाने के लिए

जी तोड़ मेहनत करता हूँ.

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ…..

थोड़ा सा काम बिगड़ जाने पर,

मालिक डांट लगाता है.

मेरी हजार रुपए की सैलरी से,

सौ रूपए कट जाता है.

फिर भी मैं दिल पर तकलीफ़ और,

होठों पर मुस्कान लिए लौट आता हूँ.

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ…..

चंद पैसे कमाने परदेश आया हूँ,

घर में बूढी माँ और बच्चों को बेसहारा

छोड़ आया हूं.

कभी-कभी उनकी चिंता सताती है,

इसलिए थोड़े से पैसे डांक पर भेज आया हूँ.

मैं मजदूर हूँ मेहनत करता हूँ…

सुरेखा नवरत्न

मैं मजदूर हूँ

Poem On Labour Day In Hindi

खुली आँखों से कैसे ये मंजर देखू!

क्यों मैं, सड़क पर भटकता हिन्दुस्तान देखू!!

भूख से बेबस हैं हर बसर यहाँ!

क्यों मैं, इंसानियत की जलती तासीर देखू!!

नफरतों से देखू या उम्मीदों की डोर से!

क्यों मैं, निर्वाचित सरकारों की निष्ठूरता देखू!!

हैं यहां झूठे और स्वार्थी नेताओं का जमावड़ा!

क्यों मैं, वैश्विक विपत्ति मे राजनीतिक जहर देखू!!

जिन शहरों की चकाचौंध मे खून-पसीना बहाया!

क्यों मैं, आज वहाँ जीवन को लूटता देखू!!

फलती-फूलती इन दुश्चारियों में!

क्यों मैं, हर रोज गमों से होती यारी देखू!!

भय, भूख, खौफ, तन्हाई!

क्यों मैं, इन सबको मुझमे देवू!!

मैं मजदूर हूँ, कोई तो समझो दर्द-औ-गम मेरा!

क्यों मैं, आज मुड़कर मेरा गाँव देखू!!

अमन

मजदूर

Poem On Labour Day

मजदूर हूँ साहब चैन से

कहां सो पाता हूँ,

कितनी ही उलझनों मैं

हर रोज उलझ जाता हूं।

क्या गर्मी, क्या सर्दी,

बारिश को बी सहन कर जाता हूँ।

भरनी है बच्चों की फीस इसलिए

ओवर टाईम बी कर जाता हूँ।

खुद की उलझनों को

बी कहा सुलझा मै पाता हूँ।

मजदूर हूँ साहब चैन से

कहा सौ पाता हूँ।

अपने ही सपनो को बी

कहा पूरा मैं कर पाता हूं।

देश के विकास में,

मैं बी तो खून पसीना बहाता हूं,

महंगाई के इस दौर में पेट भर बी

कहा खा पाता हूं।

दो जोड़ी कपड़े में पूरा साल निकाल जाता हूं,

मजदूर हूँ साहब चैन से कहा सौ पाता हूँ।

अपनी ही मजदूरी का उचित मोल

बी कहा लगा पाता हूँ,

अपने ही बच्चों की जरूरतों को

बी कहा पूरा मैं कर पाता हूँ।

जी लेता हूँ अपनी जिंदगी खामोशी से,

किसी से कुछ कह बी तो नही पाता हूं।

अपने हाथ पैर के छालों को

घर वालो से बी छुपाता हूं,

मजदूर हूँ साहब चैन से

कहा सौ पाता हूँ।

गुरमीत भोला नए सपनो को

लेकर निकला है मंजिल पर,

हर बार रास्ते बी कहाँ

मैं बदल पाता हूं।

दो वक़्त की रोटी पर,

जीवन सारा लुटाता हूं।

कितनी ही उलझनों में,

हर बार उलझ जाता हूँ।

मजदूर हूँ साहब चैन से

कहा सौ पाता हूँ।

क्या होगा बच्चों का भविष्य,

इसी घुटन में अंदर तक घुट जाता हूं।

बुखार,पेट दर्द,सर दर्द में बी

काम पूरा करता हूं।

तभी तो बच्चों का पेट

पूरी मेहनत से भरता हूं।

सुबह निकलता हूं,

शाम को आता हूं,

अपने ही घर में,

मैं मेहमान बन जाता हूं।

मजदूर हूँ साहब चैन से

कहा सौ पाता हूँ।

-गुरमीत भोला

तड़पता मजदूर

Poem On Labours Day

फ़िकरों ने मत मारी लोगों

उम्र बीत गई सारी लोगो

बार-बार पंख काटते जालिम

कैसे भरे उड़ारी लोगों

तड़पता आज मजदूर बेचारा

हाकिम पड़ गए भारी लोगो

गंदी नीति कारण चटकी

आज मजदूरी हारी लोगों

जो दुख देता मासूमों को

उसकी भी आयेगी बारी लोगों

हाथ बंदरों के गेंद आ गई

खीच-2 खूब खिलारी लोगों

इज्जत रखा खूब संभाली

जो मिले न उधारी लोगो

हर जगह लुटेरे मंगते घूमेते

रखवालो ने फसल उजाडी लोगों

सलेमपुर ‘लक्खा’ सच बोले

जग की रीत न्यारी लोगों ।

लखविंदर सिंह

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